ऐसा क्यों हो रहा है?
मैं आध्यात्मिक स्तर से अपनी बात समझाने का प्रयास करूंगा। इसीलिए मैंने अपने इस शोध पत्र को दो भागों में बांट दिया है।
पहले हम भगवत्ता को समझने का प्रयास करेंगे। इसके बाद आतंकवाद के कारणों की जड़ पर प्रकाश डालकर इसे समझने का प्रयास करेंगे।
भगवत्ता का अर्थ क्या है?
-मैं योग को ही भगवत्ता मानता हूँ।
तो फिर योग का अर्थ क्या है?
मेरे मतानुसार योग का अर्थ है अतीत में वर्तमान को जोड़कर भविष्य का सृजन करना। आधुनिक कुछ नहीं होता। अतीत में ही नया जब जुड़ जाता है तो वह आधुनिक बन जाता है। जैसे पति में जब पुत्र जुड जाता है तो वह पति से पिता हो जाता है। पिता हो जाने पर कोई मनुष्य पति होने से महरूम नहीं किया जा सकता। और पति होने पर किसी का भाई होने का अधिकार उससे नहीं छीना जा सकता। भविष्य भी हमेशा अतीत के पेट से ही जन्म लेता है।
फिर भविष्य क्या है?
-आगे बढना..क्रमिक विकास..
गीता में भगवान श्री कृष्ण अपने मनुष्य सखा अर्जुन से कहते हैं-ये योग है...जिसे मैने सूर्य से कहा। सूूर्य ने मनु से कहा और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा। पर काल के गाल में यह विस्मृत हो गया है.. और हे मनुष्य श्रेष्ठ अर्जुन.. इस योग को मैं तुम्हें पुन: याद दिलाता हूँ..
तो यहां भगवान श्री कृष्ण यह कह रहे हैं कि जब-जब भगवान की भगवत्ता को विस्मृत किया जाता है। तब-तब भगवान इसे याद दिला के विकसित करने के लिए प्रकट होते हैं। यहां श्री कृष्ण ने सोग का अर्थ यह स्पष्ट नहीं किया है कि हमें अतीत को याद रखना है। अतीत की स्तुति करनी है। अतीत का ही भोग करना है। बल्कि श्री कृष्ण ने तो स्वयं अपने सम्पूर्ण जीवन काल में कभी भी अपने किसी अतीत अवतार रूप का सहारा नहीं लिया। बल्कि स्वयं अपना ही सहारा लिया... और सत्य भी है। श्री कृष्ण ने अर्जुन से यह नहीं कहा कि यह भगवान श्री राम के नाम पर युद्ध लडे। बल्कि सीना ठोक कर कहा कि ऐसा वे यानि श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं इसलिए युद्ध लड़ा जाये। युद्ध श्री कृष्ण के नाम से लड़ा जाये।
क्रमश:
Saturday, April 3, 2010
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