अरस्तु ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इस सामाजिकता की वजह से ही विगत शताब्दियों में कई क्रान्तियाँ हुई..। लेकिन हमने इन क्रांतियों को धराशायी होते भी देखा है। रूस की कम्युनिस्ट विचारधारा अव्यावहारिक हो गयी, क्योंकि इसमें अधिकार को विरोध द्वारा प्राप्त करने का प्रावधान था। जड़ता भी थी। इधर कई देश स्वतंत्र होने के बाद अपने ही देशवासियों द्वारा गुलाम बना लिये गये। यानि घर के दीपक ही घर को जलाने लगे। दीपकों की कतार श्मशानों, कब्रिस्तानों और शवों के सिरहाने सजायी जाने लगी। बाड़ ही खेत को खाने लगी।
तो प्रश्न यह उठता हैं कि मूल्य लगातार टूटते क्यों चले गये? मान्यताएं लगातार इतने बलिदानों के बावजूद भी असफल क्यों होती चली गयी? हालांकि अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पर यह सामाजिक प्राणी इतना असामाजिक क्यों होता चला गया? प्र्रश्न गम्भीर है। समझता हूँ कि यह एक गम्भीर विश्लेषण भी चाहता है।
मुझे यह कहने में कोई संकोच महसूस नहीं होता कि मनुष्य ने अपने स्वभाव पर गम्भीर चिंतन नहीं किया है। हमने मानव जीवन को ड्रार्इंगरूम समझ लिया है। अहंकारवश हम इसमें भावुक विचारधाराओं का श्रृंगार करने लगे हैं... हालांकि हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि कोई भी घर उसकी दीवारों से नहीं जाना जाता बल्कि उससे तो वह केवल मकान कहलाता है। घर के मायने हैं उसमें रहने वाले लोग।
ठीक यही गलती हमने मानवदेहरूपी घर के साथ की है। हमने शरीर को दीवार बना डाला है। अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पश्चिम कहता है कि मनुष्य आर्थिक प्राणी है। भारत कहता है कि मनुष्य एक धार्मिक प्राणी है। पर मैं कहता हूँ कि मनुष्य जन्मजात आध्यात्मिक प्राणी है। मैं डार्विन से बहुत प्रभावित हूँ क्योंकि डार्विन का विकासवाद का सिद्धान्तत इतना प्राकृतिक है कि इसको नकारा ही नहीं जा सकता।जब कभी भी मैं बहती नदी को देखता हूँ। उसकी पवित्रता और शीतलता को अपने गले से जिगर में उतारता हूँ तो महसूस होता है कि कहीं ऐसा न हो कि मेरा पेट एक कुंआ बन जाये, और इसमें नदी का पानी अपने स्वाभावनुकूल परिस्थितियाँ ना पाकर क्रांति कर दे? शायद यही सोचकर ईश्वर ने हमारे शरीर में नौ दरवाजे रख छोडे हैं जिनसे गति का सर्पिल विकास निरंतर बना रहे... आंख, नाक, मुंह, मलद्वार आदि ये सभी शरीर के द्वार हैं। दीवार नहीं हैं। जैसे कि मैने पूर्व में कहा कि मनुष्य एक आध्यात्मिक प्राणी है। मनुष्य का शाश्वत स्वभाव भगवत्ता है। पर आज मनुष्य अपने मूल स्वभाव भगवत्ता को विकृत कर जाति से ही आतंकवादी बन रहा है... क्रमश:
Friday, April 2, 2010
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