कभी-कभी मुझे लगता है कि इस पृथ्वी के संविधान को अब एक नूतन विधान की आवश्यकता है। कारण यह है कि धर्म ने तो सूर्य को पृथ्वी के सदियों तक चक्कर लगवा दिये थे... ये तो भला है इस विज्ञान का कि जिसने सूर्य को धर्म के श्राप से मुक्त किया। इस महान विज्ञान ने ही तब अपने भाई धर्म से कहा था-‘‘भैया...पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगा रही है... सूर्य तो सौर मंडल का एक स्थिर तिलक है।’’
कहने का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी पर रहने वाले हम सभी मनुष्यों को भी पृथ्वी माता जैसा ही गतिशील होना चाहिए। विज्ञान ठीक कहता है। गीता भी ठीक कहती है कि कर्म ही पृथ्वी का प्रतिनि धित्व कर सकते हैं। संतान को अपने मां बाप पर तो जाना ही चाहिए न ? यह पृथ्वी हमारी मां है... और सूर्य हमारा प्राचीन पिता है।
तो गीता को समझने के लिए बस इतना भर करना है कि हम अपनी विराट मां धरती के कर्म को समझ लें। क्या कभी आपने सोचा है कि यह मां अरबों-खरबों वर्षांे से उस बियावन-सुनसान ब्रह्माण्ड में हमारे लिए अपनी धुरी और सूर्य का चक्कर क्यों लगा रही है? इसलिए नहीं कि उसे घूमने-फिरने का बड़ा शोक है? बल्कि इसलिए कि जिससे धरती पर जीवन हंसता-खेलता रहे... हम जन्म लेते रहे...
कभी-कभी मुझे ऐसा भी लगता है कि मनुष्य को अगर कर्म को सही रूप में समझना है तो उसे ब्रह्माण्ड में झांक कर पृथ्वी को सूर्य के चारों और घूमते हुए एक बार अवश्य देखलेना चाहिए... इसीलिए विज्ञान को मैं श्रीकृष्ण की ‘सुदर्शन शक्ति’ कहता हूं... मुझे हमेशा श्रीकृष्ण की की ‘सुदर्शन चक्र-’ विज्ञान और पृथ्वी का प्रतिरूप का लगता रहा है... इधर यही ‘ सुदर्शन चक्र’ सािहत्य में शब्द रूप में लेखकों, कवियों, विचारकों ओर पत्रकारों की अंगुलियों के मध्य कलम बनकर ‘शब्द’ द्वारा सृजन के नवीन विस्फोट कर रहा है...
हमारे यहां लोकतंत्र के चार स्तंभ बतलाये गए हैं। चौथा स्तंभ पत्रकारिता यानि शब्द विज्ञान को बतलाया गया है। अध्यात्म में जिस तरह ‘तीसरी आंख’ का महत्व है- लोकतंत्र में उसी तरह ‘चौथी आंख’ यानि पत्रकारिता का महत्व है। मैं आने वाले भविष्य पर कुछ संकेत देना चाहता हूं... बात यह है कि सन् 2012 से चौथी दुनिया के लोग इस प्राचीन ग्रह के राजकुमार घोषित किये जाने लगेंगे... ऐसा अज्ञात अस्तित्व में तय हुआ है। — रविदत्त मोहता
Saturday, October 10, 2009
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