Monday, November 2, 2009

संसार और सन्यास

संसार जब किसी मनुष्य के हृदय मे ‘‘न्यास याने ट्रस्ट’’ हो जाता है तो उसे ही ‘सन्यासी’ कह देते हैं। किसी मनुष्य के लिए संसार का न्यास में ट्रस्ट में बदल जाना ही सन्यास है। अत: मनुष्य संसार को धर्म से नहीं बल्कि इसका ‘न्यासी’ हो जात है। ट्रस्टी हो जाता है। इसी कारण गांधी जैसा साधारण व्यक्ति सच्चे अर्थाें में राष्टÑपिता बनकर भी सन्यासी था। महात्मा है।
लेकिन इस वैज्ञानिक युग में मनुष्य मात्र किताबी चेतना से सच को समझने का प्रयास कर रहा है। यही उसके पतन का कारण है। शास्त्र और ग्रंथ तो मार्ग हैं। इन पर चलकर मनुष्य सत्य के द्वार पर पहुंच जाता है। लेकिन द्वार तो स्वयं को ही खोलना पड़ता है। अत: क्लेश ‘संसार’ और ‘संसार’ और ‘संन्साय’ के बीच नहीं हैं। झगड़ा तो मनुष्य की समझ के जिद्दी हो जाने से है।
अगर हम करुणा के उत्तरदायी सिंहासन पर बैठाकर दुनिया को देखेंगे तो समूचा जगत हमें हमारे घर से निकलता और घर में ही प्रविष्ट होकर विकसित होता दिखाई देगा। लेकिन अगर हम दूसरे के घर से सत्य का द्वार आरंभ करते है तो वह मनुष्य द्वारा लिखा जाने वाला साहित्य हो जाता है। संसार से ज्यादा महान सन्यास है। मनुष्य का इस संसार का न्यासी हो जाना ही सन्यासी हो जाना है। यही अध्यात्म का परम विकास है। यही अतिमानवता हैं।
रविदत्त मोहता

Saturday, October 10, 2009

नूतन विधान का वर्चस्व

कभी-कभी मुझे लगता है कि इस पृथ्वी के संविधान को अब एक नूतन विधान की आवश्यकता है। कारण यह है कि धर्म ने तो सूर्य को पृथ्वी के सदियों तक चक्कर लगवा दिये थे... ये तो भला है इस विज्ञान का कि जिसने सूर्य को धर्म के श्राप से मुक्त किया। इस महान विज्ञान ने ही तब अपने भाई धर्म से कहा था-‘‘भैया...पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगा रही है... सूर्य तो सौर मंडल का एक स्थिर तिलक है।’’
कहने का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी पर रहने वाले हम सभी मनुष्यों को भी पृथ्वी माता जैसा ही गतिशील होना चाहिए। विज्ञान ठीक कहता है। गीता भी ठीक कहती है कि कर्म ही पृथ्वी का प्रतिनि धित्व कर सकते हैं। संतान को अपने मां बाप पर तो जाना ही चाहिए न ? यह पृथ्वी हमारी मां है... और सूर्य हमारा प्राचीन पिता है।
तो गीता को समझने के लिए बस इतना भर करना है कि हम अपनी विराट मां धरती के कर्म को समझ लें। क्या कभी आपने सोचा है कि यह मां अरबों-खरबों वर्षांे से उस बियावन-सुनसान ब्रह्माण्ड में हमारे लिए अपनी धुरी और सूर्य का चक्कर क्यों लगा रही है? इसलिए नहीं कि उसे घूमने-फिरने का बड़ा शोक है? बल्कि इसलिए कि जिससे धरती पर जीवन हंसता-खेलता रहे... हम जन्म लेते रहे...
कभी-कभी मुझे ऐसा भी लगता है कि मनुष्य को अगर कर्म को सही रूप में समझना है तो उसे ब्रह्माण्ड में झांक कर पृथ्वी को सूर्य के चारों और घूमते हुए एक बार अवश्य देखलेना चाहिए... इसीलिए विज्ञान को मैं श्रीकृष्ण की ‘सुदर्शन शक्ति’ कहता हूं... मुझे हमेशा श्रीकृष्ण की की ‘सुदर्शन चक्र-’ विज्ञान और पृथ्वी का प्रतिरूप का लगता रहा है... इधर यही ‘ सुदर्शन चक्र’ सािहत्य में शब्द रूप में लेखकों, कवियों, विचारकों ओर पत्रकारों की अंगुलियों के मध्य कलम बनकर ‘शब्द’ द्वारा सृजन के नवीन विस्फोट कर रहा है...
हमारे यहां लोकतंत्र के चार स्तंभ बतलाये गए हैं। चौथा स्तंभ पत्रकारिता यानि शब्द विज्ञान को बतलाया गया है। अध्यात्म में जिस तरह ‘तीसरी आंख’ का महत्व है- लोकतंत्र में उसी तरह ‘चौथी आंख’ यानि पत्रकारिता का महत्व है। मैं आने वाले भविष्य पर कुछ संकेत देना चाहता हूं... बात यह है कि सन् 2012 से चौथी दुनिया के लोग इस प्राचीन ग्रह के राजकुमार घोषित किये जाने लगेंगे... ऐसा अज्ञात अस्तित्व में तय हुआ है। — रविदत्त मोहता