हमारी दुनिया में भगवत्ता का धार्मि्रकीकरण हो रहा है.. कि जैसे भगवत्ता कोई धार्मिक और शारीरिक वर्जिश का क्षेत्र हो। आसन, प्राणायाम, साधना और पूजा आदि हमें भगवत्ता के प्रांगण में पहुंचाती तो है लेकिन यह भगवत्ता नहीं है। मात्र धार्मिक क्रियाएँ हैं।
मैं कहना चाह रहा हूँ कि इस पृथ्वी को विकृत मात्र योग्य व्यक्तियों ने ही किया है। प्रतिभाशाली व्यक्ति तो इस पृथ्वी मां का पुत्र बनकर जन्म लेता है जीवन जीता है। सो अगर भारत को पृृथ्वी पर पुन: अपना मुकुट धारण करना है? तो उसे अपनी चेतना में नवीन विस्फोट करने होंगे। ये सूर्यमुखी विस्फोट प्रवचनों के उद्घोषों से, गुफाओं, मठों और आश्रमों में रहकर नहीं किए जा सकते। क्योंकि वहां अतीत की धार्मिक पादुकाएँ हैं। तस्वीरें हैं। व्यास पीठें हैं। ये स्थान श्रद्धा तो पैदा कर सकते हैं। लेकिन फिर कुछ समय के बाद ईश्वर को श्रद्धांजलि भी अर्पित कर देते हैं। इधर भगवान यानि सत्य किसी मानवीय श्रद्धांजलि का मोहताज नहीं है। कोई भी स्वर्गीय तस्वीर हमारे बहुमूूल्य जीवन में सत्य का नया डीएनए पैदा नहीं कर सकती। वर्तमान सत्य की देह है। कर्म इस देह की आत्मा है।
आज ही अब को गले लगा सकता है। क्योंकि आज और अब दोनों उपस्थित हैं - अध्यात्म की देह में। पृथ्वी पर। युग में। इसे अब आप यूं समझें, अगर सुदूर ब्रह्माण्ड में महा अकेले सूर्य के गर्भसाल में लगातार विस्फोट नहीं होते रहें..आज और अब तथा अभी-अभी न होते रहें तो क्या हम जीवित रह सकते हैं? थिंक इट? सूर्य का गर्भाशय क्रमिक विकास का जीता-जागता प्रमाण है। क्रमिक विकास गर्भस्थल में ही होता है। मनुष्य का गर्भस्थल चेतना का डीएनए है मेडिकल साईन्स का डीएनए शारीरिक स्तर तक ही सीमित है। लेकिन आध्यात्मिक डीएनए चेतना के स्तर पर होता है। इसलिए पहले चेतना का डीएनए विकसित होता है। फिर यहीं विकसित चेतना शरीर को विकसित करने का कारण बनती है। बॉडी डीएनए विकसित होता है।
तो अगर बहुत सामान्य भाषा में कहा जाये तो उचित होगा कि पृथ्वी पर अगर कहीं महेन्द्र पैदा होता है- तो उसे पूरा महेन्द्र बनने का अवसर प्रदान किया जाये। अगर कल्लू पैदा हो तो उसे कल्लू ही बनने का सहयोग प्रदान किया जाये। क्योंकि अगर हमने उसे गांधी, बुद्ध, राम, कृष्ण, दयानन्द, अरविंद आदि बनने को बाध्य किया तो हमारे द्वारा अनजाने में किसी माता के दुलारे महेन्द्र और कल्लू की हत्या हो जायेगी। अतीत का विकृत फोटोजेनिक पुनर्जन्म होता चला जायेगा। यह पुर्नजन्म विकास नहीं होता। आध्यात्म नहीं होता। संक्राति नहीं होती। धर्म हो जाता है। परिणामत: इस धरा पर भगवान का जन्म नहीं हो सकेगा। दसवें अवतार हिन्दू संस्कृति के मतानुसार श्री कल्कि को ्रप्रकट होने में देरी होगी। कारण हम ही होंगे क्योंकि गीता में श्री कृृष्ण कह गये हैं कि जो जिस प्रकार मेरा भजन करता है-उसे ठीक उसी प्रकार का मैं प्रत्युत्तर देता हूँ। क्रमश:
भगवान हर युग में अपनी मौलिक प्रतिभा से प्रकट होते हैं। नवीन योग द्वारा पृथ्वी पर अट्टाहास करते हुए हँुकार भरते हैं- ये योग है... जिसे मैने सूर्य से कहा था...
अत: अगर हमने अतीत के धार्मिक भोग का क्रम जारी रखा तो प्रकृति अपनी विनाशलीला से हमें अपने पांवों पर खड़ा करके ही दम लेगी। क्योंकि पृथ्वी और प्रकृति सगी बहनें हैं। पृथ्वी मॉं को स्वास्थ्य प्रकृति बहन से ही प्राप्त होता है। और प्रकृति अपनी कालजयी बड़ी बहन पृथ्वी को अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करने के लिए अपने गर्भ में कई विनाशकारी भूकंप पैदा कर सकती है। साथ ही अंतरिक्ष से भी कोई आपदा हम तक पहुँच सकती है। क्योंकि हम भी अंतरिक्ष में ही रहते हैं। पृथ्वी भी अंतरिक्ष में ही लटकी हुई अपनी धुरी पर घूम रही है। इधर ब्रह्माण्ड अपने उत्तरोत्तर विकास में पृथ्वी को भी अपने साथ लिए सहज गति से आगे...और आगे फैलता जा रहा है....
एक कविता से अपनी बात स्पष्ट कर रहा हूँ-
भूमि का कोई स्वभाव नहीं होता।
यह मात्र उपजाऊ होती है।।
बीज का स्वभाव होता है।
पर उपजाऊ नहीं होता।।
गुलाब का बीज
भूमि में मिलकर
गुलाब ही पैदा करता है।
भूमि पैदा नहीं करता।
इस तरह बीज योग है।
पर भूमि अतीत है।।
तो अगर रेत में
रेत का बीजारोपण करेंगे...
तो रेत ही पैदा होगी।।
यह रेत योग नहीं है
अतिमानवता नहीं है।
भोग है।।
बीज योग है।
अतिमानवता है।।
भगवान है।।
यदा-यदा ही धर्मस्य है।।
तो संकट बीज का है ।
आज पूरा विश्व ही एक विश्वग्राम में बदल चुका है। मुझे याद आता है कि हमारे एक श्रद्धेय स्वामी जी हैं। आपने प्रभु प्रेरणा से भारत माता मंदिर बनवाया है। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ इस कारण उनसे खुलकर बातचीत भी कर लेता था। मैं जब हरिद्वार उस मंदिर में गया तो मैं भारत माता से मिलना चाहता था। लेकिन बहुत गहरा ध्यान करने पर भी मुझे उस महान मंदिर के प्रांगण में भारत माता के दर्शन नहीं हुए। मैं निराश लौट आया।
यहां मैं एक रहस्य और उद्घाटित करना चाहता हूँ। वह यह है कि अतिमानव के प्रकटीकरण के लिए महर्षि अरविंद को सभी देवताओं ने सहायता करने को फिलहाल मना कर दिया था। मात्र मेरे गुरू श्री कृष्ण ही थे- जिन्होंने श्री अरविंद से कहा- तुम आगे बढो मैं आनंद के माध्यम से तुम्हारी सहायता करूंगा। यहां मैं आपको यह भी बतला दूं कि अतिमानस इतना कठोर है कि मनुष्य उसका स्पंदन तक सहन नहीं कर सकता। अगर श्रीकृष्ण अपनी आनंदकला से मनुष्य उसका स्पंदन तक सहन नहीं कर सकता। अगर श्रीकृष्ण अपनी आनंदकला से मनुष्य की सहायता न करें। अतिमानस बहुत कठोर, कसैला और अपने स्वभाव से टस से मस नहीं होने वाली प्रकृति का है। यह पहली बार पृथ्वी की ओर आया है....
तो यहां यह स्पष्ट होता है कि असत्य की विजय का उद्घोष भी भावनात्मक स्तर का है। भावुक दृष्टिकोण है। क्योंकि सत्य को असत्य के कारण क्योंकर सक्रिय होना चाहिए? दूसरे शब्दों में जन्म लेना चाहिए। मैं आप सभी के सामने चिंतन के लिए एक प्रश्न छोड़ता हूँ- सत्य को मात्र सत्य की स्थापना के लिए क्यों नहीं जन्म लेना चाहिए? मेरे विचार से तो सतयुग की स्थापना तभी हो सकती है।
तो मेरी प्रार्थना है कि दसवें अवतार श्रीकल्किजी का अब मात्र सत्य के कारण सत्य की स्थापना के लिए अब अवतार लेना चाहिए। हमारी प्राचीन अवतार प्रणाली में भी संशोधन की आवश्यकता है। इसलिए अतीत एक भावुक अवतार है। अतीत की स्तुति आतंक कैसे बनती है? आइये अब इसे समझते हैं।
परम्परा के मतानुसार सृष्टि की सबसे सुन्दर कृति मनुष्य है। यह भी कहा जाता है कि इस सुन्दर कृति को बनाने वाला ईश्वर इससे भी अधिक सुन्दर है। परन्तु परम्परा के विचारकों और सन्यासियों ने मनुष्य और ईश्वर के क्रमिक विकास को अवरूद्ध करके रख दिया है। विचारकों ने अपने दार्शनिक विचारों के आधार पर इस सुन्दरता पर किताबें लिख कर, इस जैविक सुन्दरता को जड़ बना डाला है। इसी कारण विभिन्न दार्शनिक मतावलियां जगत में पैदा हो गयी हैं। सन्यासियों ने अपनी-अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को मंन्दिरों, मस्जिदों, गुरूद्वारों और गिरजाघरों आदि में बदलकर परमसत्य को इसमें कैद करके रख दिया है। इस कारण एक प्राकृतिक सत्य स्थूलता में बदल गया है। आचरण उच्चारण में बदल गया।
इधर एक हस्तक्षेप पार्थिव जगत में विज्ञान के माध्यम से हुआ है। विज्ञान ने इन दोनों ही सत्यों मनुष्य और ईश्वर को नकारकर एक नये धर्म का बीजारोपण किया। इसे कहा तो विज्ञान गया, परंतु यह धर्म का ही छद्म रूप है। यहां मैं यह जरूर स्पष्ट करना चाहूँगा कि जब हम किसी सत्य कोे नकार कर आविष्कार करते हैं तो यह नक्कारखाने की तूती बन जाता है। धर्म बन जाता है। इसलिए अल्बर्ट आइंसटिन ने अपनी मृत्युशैया पर स्वयं को एक साइंटिफिक सेंट की तरह याद किये जाने की अंतिम इच्छा व्यक्त की थी।
तो शनै:-शनै: विज्ञान की आविष्कारिक और खोज परक प्रकृति के कारण एक और हस्तक्षेप भी पार्थिव जगत में हुआ। इसे आर्थिक शक्ति कहा गया। इस नवीन आर्थिक धर्म के मानने वालों ने कहा कि सबसे बड़ा धर्म है- आर्थिक ऐश्वर्य। इसी कारण पूरा विश्व एक ऐसे वायरस में पीड़ित हो गया जिसे छोड़ा भी नहीं जा सकता और अपनाया भी नहीं जा सका। यानि धीरे-धीरे समझ में यह आता है कि यह दुनिया धार्मिक ही होती चली गई। वह भी जड़ धार्मिक।
इस तथ्यात्मक विवेचन के बाद प्रश्न यह खड़ा होता है कि मानव जगत का संकट क्या है? तो फिर दूसरा प्रश्न यह खड़ा होता है कि मानव को परेशानी क्या है?
वस्तुत: धरती पर मानव की उत्पत्ति के युग को पाषाण युग कहा जाता है। यानि जब ईश्वर ने धरती पर मनुष्य तो यहां पाषाणों का आधिक्य था। पाषाणों से बने गहनें, बरतन और हथियार ही मनुष्य के जीवित रहने के एक मात्र साधन थे। चंूकि दा काल की चेतना भी पाषाणी यानि जड़ थी। इस कारण मनुष्य एक बेबसी में घिर गया। उसका विकास अपनी इस महाबेबसी के कारण रूक गया। अत: वह एक सुरक्षात्मक जीवन जीने लगा। कारण कि उस युग में मौत का खतरा प्रति क्षण मनुष्य के आगे रहता था। अत: यहीं से मानव चेतना में डर और भय की वजह से अंधकार की शक्ति का हस्तक्षेप हुआ। और बेबसी के कारण धर्म नामक स्पन्दन का जन्म हुआ। यह मानसिक स्पन्दन अंधेरे की शक्ति का प्रभाव था। इसी कारण मनुष्य धर्मभीरू होता चला गया। और आज हालात यह है कि दुनिया का सबसे विकसित राष्टÑ अमेरिका भी उस एक मत का सहारा लेता है- जिसे कई हजार वर्षो पूर्व किसी परिपक्व शिखर पुरूष ने मनुष्य के तात्कालिक खतरों को दूर भगाने के लिए प्रकट किये थे।
तो मूलभूत समस्या मानव के मानसिक और हार्दिक प्रांगण में ठहर कर रूक जाना है। ठिठक कर ठहरा हुआ पानी जिस तरह बदबूदार और गंदा नाला बन जाता है ठीक इसी तरह कई हजार वर्षो का ठहरा हुआ विश्वास और अनुभव भी बदबुदार और कीटाणुयुक्त हो गये हैं। इससे मानव के मानसिक और हार्दिक प्रांगण को कई बिमारियों ने घेर लिया है... क्यों? क्योंकि कुछ लोग परमसत्य को एक अति प्राचीन उद्घोष वेद के नाम से स्थापित करना चाहते हैं। तो वहीं कुछ इस स्वप्न को अपनी परम्परा के मतानुसार बाईबल, कुरान या गुरूग्रंथ साहब नामक पवित्र शस्त्रों के आधार पर स्थापित होता देखना चाहते हैं। इधर हाल में भारत में बहुत धार्मिक अभियान पिछले पचास साठ वर्षो में आरंभ हुए हैं।
Sunday, April 4, 2010
Saturday, April 3, 2010
भविष्य पुराण
ऐसा क्यों हो रहा है?
मैं आध्यात्मिक स्तर से अपनी बात समझाने का प्रयास करूंगा। इसीलिए मैंने अपने इस शोध पत्र को दो भागों में बांट दिया है।
पहले हम भगवत्ता को समझने का प्रयास करेंगे। इसके बाद आतंकवाद के कारणों की जड़ पर प्रकाश डालकर इसे समझने का प्रयास करेंगे।
भगवत्ता का अर्थ क्या है?
-मैं योग को ही भगवत्ता मानता हूँ।
तो फिर योग का अर्थ क्या है?
मेरे मतानुसार योग का अर्थ है अतीत में वर्तमान को जोड़कर भविष्य का सृजन करना। आधुनिक कुछ नहीं होता। अतीत में ही नया जब जुड़ जाता है तो वह आधुनिक बन जाता है। जैसे पति में जब पुत्र जुड जाता है तो वह पति से पिता हो जाता है। पिता हो जाने पर कोई मनुष्य पति होने से महरूम नहीं किया जा सकता। और पति होने पर किसी का भाई होने का अधिकार उससे नहीं छीना जा सकता। भविष्य भी हमेशा अतीत के पेट से ही जन्म लेता है।
फिर भविष्य क्या है?
-आगे बढना..क्रमिक विकास..
गीता में भगवान श्री कृष्ण अपने मनुष्य सखा अर्जुन से कहते हैं-ये योग है...जिसे मैने सूर्य से कहा। सूूर्य ने मनु से कहा और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा। पर काल के गाल में यह विस्मृत हो गया है.. और हे मनुष्य श्रेष्ठ अर्जुन.. इस योग को मैं तुम्हें पुन: याद दिलाता हूँ..
तो यहां भगवान श्री कृष्ण यह कह रहे हैं कि जब-जब भगवान की भगवत्ता को विस्मृत किया जाता है। तब-तब भगवान इसे याद दिला के विकसित करने के लिए प्रकट होते हैं। यहां श्री कृष्ण ने सोग का अर्थ यह स्पष्ट नहीं किया है कि हमें अतीत को याद रखना है। अतीत की स्तुति करनी है। अतीत का ही भोग करना है। बल्कि श्री कृष्ण ने तो स्वयं अपने सम्पूर्ण जीवन काल में कभी भी अपने किसी अतीत अवतार रूप का सहारा नहीं लिया। बल्कि स्वयं अपना ही सहारा लिया... और सत्य भी है। श्री कृष्ण ने अर्जुन से यह नहीं कहा कि यह भगवान श्री राम के नाम पर युद्ध लडे। बल्कि सीना ठोक कर कहा कि ऐसा वे यानि श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं इसलिए युद्ध लड़ा जाये। युद्ध श्री कृष्ण के नाम से लड़ा जाये।
क्रमश:
मैं आध्यात्मिक स्तर से अपनी बात समझाने का प्रयास करूंगा। इसीलिए मैंने अपने इस शोध पत्र को दो भागों में बांट दिया है।
पहले हम भगवत्ता को समझने का प्रयास करेंगे। इसके बाद आतंकवाद के कारणों की जड़ पर प्रकाश डालकर इसे समझने का प्रयास करेंगे।
भगवत्ता का अर्थ क्या है?
-मैं योग को ही भगवत्ता मानता हूँ।
तो फिर योग का अर्थ क्या है?
मेरे मतानुसार योग का अर्थ है अतीत में वर्तमान को जोड़कर भविष्य का सृजन करना। आधुनिक कुछ नहीं होता। अतीत में ही नया जब जुड़ जाता है तो वह आधुनिक बन जाता है। जैसे पति में जब पुत्र जुड जाता है तो वह पति से पिता हो जाता है। पिता हो जाने पर कोई मनुष्य पति होने से महरूम नहीं किया जा सकता। और पति होने पर किसी का भाई होने का अधिकार उससे नहीं छीना जा सकता। भविष्य भी हमेशा अतीत के पेट से ही जन्म लेता है।
फिर भविष्य क्या है?
-आगे बढना..क्रमिक विकास..
गीता में भगवान श्री कृष्ण अपने मनुष्य सखा अर्जुन से कहते हैं-ये योग है...जिसे मैने सूर्य से कहा। सूूर्य ने मनु से कहा और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा। पर काल के गाल में यह विस्मृत हो गया है.. और हे मनुष्य श्रेष्ठ अर्जुन.. इस योग को मैं तुम्हें पुन: याद दिलाता हूँ..
तो यहां भगवान श्री कृष्ण यह कह रहे हैं कि जब-जब भगवान की भगवत्ता को विस्मृत किया जाता है। तब-तब भगवान इसे याद दिला के विकसित करने के लिए प्रकट होते हैं। यहां श्री कृष्ण ने सोग का अर्थ यह स्पष्ट नहीं किया है कि हमें अतीत को याद रखना है। अतीत की स्तुति करनी है। अतीत का ही भोग करना है। बल्कि श्री कृष्ण ने तो स्वयं अपने सम्पूर्ण जीवन काल में कभी भी अपने किसी अतीत अवतार रूप का सहारा नहीं लिया। बल्कि स्वयं अपना ही सहारा लिया... और सत्य भी है। श्री कृष्ण ने अर्जुन से यह नहीं कहा कि यह भगवान श्री राम के नाम पर युद्ध लडे। बल्कि सीना ठोक कर कहा कि ऐसा वे यानि श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं इसलिए युद्ध लड़ा जाये। युद्ध श्री कृष्ण के नाम से लड़ा जाये।
क्रमश:
Friday, April 2, 2010
भविष्य पुराण
अरस्तु ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इस सामाजिकता की वजह से ही विगत शताब्दियों में कई क्रान्तियाँ हुई..। लेकिन हमने इन क्रांतियों को धराशायी होते भी देखा है। रूस की कम्युनिस्ट विचारधारा अव्यावहारिक हो गयी, क्योंकि इसमें अधिकार को विरोध द्वारा प्राप्त करने का प्रावधान था। जड़ता भी थी। इधर कई देश स्वतंत्र होने के बाद अपने ही देशवासियों द्वारा गुलाम बना लिये गये। यानि घर के दीपक ही घर को जलाने लगे। दीपकों की कतार श्मशानों, कब्रिस्तानों और शवों के सिरहाने सजायी जाने लगी। बाड़ ही खेत को खाने लगी।
तो प्रश्न यह उठता हैं कि मूल्य लगातार टूटते क्यों चले गये? मान्यताएं लगातार इतने बलिदानों के बावजूद भी असफल क्यों होती चली गयी? हालांकि अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पर यह सामाजिक प्राणी इतना असामाजिक क्यों होता चला गया? प्र्रश्न गम्भीर है। समझता हूँ कि यह एक गम्भीर विश्लेषण भी चाहता है।
मुझे यह कहने में कोई संकोच महसूस नहीं होता कि मनुष्य ने अपने स्वभाव पर गम्भीर चिंतन नहीं किया है। हमने मानव जीवन को ड्रार्इंगरूम समझ लिया है। अहंकारवश हम इसमें भावुक विचारधाराओं का श्रृंगार करने लगे हैं... हालांकि हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि कोई भी घर उसकी दीवारों से नहीं जाना जाता बल्कि उससे तो वह केवल मकान कहलाता है। घर के मायने हैं उसमें रहने वाले लोग।
ठीक यही गलती हमने मानवदेहरूपी घर के साथ की है। हमने शरीर को दीवार बना डाला है। अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पश्चिम कहता है कि मनुष्य आर्थिक प्राणी है। भारत कहता है कि मनुष्य एक धार्मिक प्राणी है। पर मैं कहता हूँ कि मनुष्य जन्मजात आध्यात्मिक प्राणी है। मैं डार्विन से बहुत प्रभावित हूँ क्योंकि डार्विन का विकासवाद का सिद्धान्तत इतना प्राकृतिक है कि इसको नकारा ही नहीं जा सकता।जब कभी भी मैं बहती नदी को देखता हूँ। उसकी पवित्रता और शीतलता को अपने गले से जिगर में उतारता हूँ तो महसूस होता है कि कहीं ऐसा न हो कि मेरा पेट एक कुंआ बन जाये, और इसमें नदी का पानी अपने स्वाभावनुकूल परिस्थितियाँ ना पाकर क्रांति कर दे? शायद यही सोचकर ईश्वर ने हमारे शरीर में नौ दरवाजे रख छोडे हैं जिनसे गति का सर्पिल विकास निरंतर बना रहे... आंख, नाक, मुंह, मलद्वार आदि ये सभी शरीर के द्वार हैं। दीवार नहीं हैं। जैसे कि मैने पूर्व में कहा कि मनुष्य एक आध्यात्मिक प्राणी है। मनुष्य का शाश्वत स्वभाव भगवत्ता है। पर आज मनुष्य अपने मूल स्वभाव भगवत्ता को विकृत कर जाति से ही आतंकवादी बन रहा है... क्रमश:
तो प्रश्न यह उठता हैं कि मूल्य लगातार टूटते क्यों चले गये? मान्यताएं लगातार इतने बलिदानों के बावजूद भी असफल क्यों होती चली गयी? हालांकि अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पर यह सामाजिक प्राणी इतना असामाजिक क्यों होता चला गया? प्र्रश्न गम्भीर है। समझता हूँ कि यह एक गम्भीर विश्लेषण भी चाहता है।
मुझे यह कहने में कोई संकोच महसूस नहीं होता कि मनुष्य ने अपने स्वभाव पर गम्भीर चिंतन नहीं किया है। हमने मानव जीवन को ड्रार्इंगरूम समझ लिया है। अहंकारवश हम इसमें भावुक विचारधाराओं का श्रृंगार करने लगे हैं... हालांकि हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि कोई भी घर उसकी दीवारों से नहीं जाना जाता बल्कि उससे तो वह केवल मकान कहलाता है। घर के मायने हैं उसमें रहने वाले लोग।
ठीक यही गलती हमने मानवदेहरूपी घर के साथ की है। हमने शरीर को दीवार बना डाला है। अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पश्चिम कहता है कि मनुष्य आर्थिक प्राणी है। भारत कहता है कि मनुष्य एक धार्मिक प्राणी है। पर मैं कहता हूँ कि मनुष्य जन्मजात आध्यात्मिक प्राणी है। मैं डार्विन से बहुत प्रभावित हूँ क्योंकि डार्विन का विकासवाद का सिद्धान्तत इतना प्राकृतिक है कि इसको नकारा ही नहीं जा सकता।जब कभी भी मैं बहती नदी को देखता हूँ। उसकी पवित्रता और शीतलता को अपने गले से जिगर में उतारता हूँ तो महसूस होता है कि कहीं ऐसा न हो कि मेरा पेट एक कुंआ बन जाये, और इसमें नदी का पानी अपने स्वाभावनुकूल परिस्थितियाँ ना पाकर क्रांति कर दे? शायद यही सोचकर ईश्वर ने हमारे शरीर में नौ दरवाजे रख छोडे हैं जिनसे गति का सर्पिल विकास निरंतर बना रहे... आंख, नाक, मुंह, मलद्वार आदि ये सभी शरीर के द्वार हैं। दीवार नहीं हैं। जैसे कि मैने पूर्व में कहा कि मनुष्य एक आध्यात्मिक प्राणी है। मनुष्य का शाश्वत स्वभाव भगवत्ता है। पर आज मनुष्य अपने मूल स्वभाव भगवत्ता को विकृत कर जाति से ही आतंकवादी बन रहा है... क्रमश:
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