मानव इतिहास की कोहरे से भरी गुफाओं में घुसकर मैंने पूर्वजों से बाते की है। मैंने उन्हें सुबकते और सिहरते हुए देखा हैं। शब्द रूपी चक्र अपनी पांच अंगुलियों में धारण करने वाले आप सभी तो वसुदेव कृष्ण हैं, लेकिन इतिहास मुझे कहता हैं कि आप सभी इस पृथ्वी भूखण्ड के सबसे गरीब और कमजोर प्राणी है।
क्यों?
क्योंकि हम शब्दों की शक्ति को पहचान नहीं पाये। हम लेखक बने रहे। स्वयं शब्द नहीं बने। जबकि शब्द ब्रह्म हैं।
इसे मंै अच्छी तरह जानता हूं- इसलिए लिख रहा हूं कि इस पार्थिव जगत में शब्द या तो राजसिंहासनों को प्राप्त करने के लिए बोला गया। या राजाओं की चाटुकारिता के लिए लिखा गया हैं। ये दानों प्रकार के शब्द जब प्रयोग में लिये जात हैं, तो नष्ट हो जाते हैं।
जैसे कि हमारा यह शरीर है। यह भी सदियों से ऐसा कर रहा हैं। इसलिये नष्ट हो रहा है। एक प्राचीन चीज आपसे बांटना चाहता हूं -
सृष्टि के निर्माण से पूर्व शब्द नहीं था। स्वर था। स्वर जब पक कर सुर बना तो शब्द का जन्म हुआ। अर्थात सुर के गर्भ से शब्द का जन्म हुआ। और इन्हीं शब्दों के गर्भ से देवताओं का जन्म हुआ। ये देवता स्वभाव से ही स्वर में थे। इसी कारण वायुदेव से वायु, पृथ्वी देव से पृथ्वी, अग्नि देव से अग्नि और जलदेव से जल की उत्पत्ति हुई। परंतु ध्यान में रखने की बात यह है कि ये पांचों तत्व अपने स्वर में रहने के कारण ही आत तक ताजे हैं। सुर में होने के कारण अभी तक ब्रह्माण्ड में सुरक्षित और अक्षय हैं।
मेरे पूर्वजों....ब्रह्माण्ड एक प्राचीन स्वर में अपना विस्तार कर रहा है। इस कारण वहां असुरता का अस्तित्व तत्काल मिटा दिया जाता है। क्यों कि इस ग्रह पृथ्वी पर हमारा कर्म और शरीर अभी तक बेसुरा है। अमरता को प्राप्त वरदान के बावजूद भी करोड़ों वर्षो बाद भी हम सभी मरणधर्मा हैं। हम बेसुरे होने के कारण मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं।
मंै आपको सच कहता हूं कि अगर इस पृथ्वी में से शब्द को हटा दें तो यह समूची पृथ्वी ताश के पत्तों की तरह धड़ाम से ब्रह्माण्ड के आंगन में गिर पडेगी। नष्ट हो जायेगी।
कैसे?
आइये इसे समझते हैं।
पहले देवताओं का अस्तित्व नष्ट हो जायेगा।
देवताओं के अस्तित्व के नष्ट होने से पृथ्वी का सुर नष्ट हो जायेगा। पृथ्वी के सुर के नष्ट होने से ये पृथ्वी नष्ट हो जायेगी। और यह समूची सृष्टि मात्र पृथ्वी में शामिल सभी जीव पुन: ब्रहÞमाण्ड के महास्वर में विलीन हो जायेगी।
तब? ये राजसिंहासन, ये धन, प्रसिद्धि, ये सब नष्ट हो जायेंगे। हम पुनर्जन्म भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे, क्योंकि वैसी पृथ्वी बनने से फिर ब्रह्माण्ड के महास्वर को समय लगेगा। फिर स्वर पक कर सुर बनेगा। सुर के गर्भ से शब्द जन्म लेगा। यह प्रजनन पुन: आरंभ होगा।
मेरे भाइयों... मैं इसे जानता हूँ इसलिए आपको लिखता हूं कि शब्द के महत्व और शक्ति को पहचानों। आप सभी पर पृथ्वी के अस्तित्व की रक्षा का भार है। कालजयी शब्द ब्रह्म बनकर ही लिखा जा सकता है। बोला जा सकता हैं। जब आप स्वयं याब्द हो जाते हैं तो ब्रह््माण्ड हो जाते हैं। शब्द ही शस्त्र बनकर अभिशाप हो जाता हैं। संहारक हो जाता हैं। ब्रह्मास्त्र हो जाता हैं।
मेरे निराकारो...शब्द ही वंश है स्वर का। स्वर वंश है ईश्वर का। शब्द एक निराकार सत्ता हैं। क्योंकि इसकी उत्पत्ति ब्रह्माण्ड के निराकार स्वर से होती हैं।
हम कालजयी बनकर ही कालजयी साहित्य की रचना कर सकते हैं। मृत्यु को प्राप्त हो रही इस पृथ्वी को बचा सकते हैं। इसलिए अब हमें यह जिम्मेदारी उठानी है।
जिम्मेदारी को अपने पिता की अर्थी की तरह मत उठाओ बल्कि अपनी लाडली पुत्री की डोली की तरह अपने कांधो पर धारण करो।
मैं समझता हूं कि अब आम सुर और असुर को समझ गये होंगे। पुराणों में जिन राक्षसों यानि असुरों और जिन देवताओं याने सुरों का जिक्र आता है। वे कौन हैं? आप समझे कि नहीं? अच्छा मैं समझाता हँू।
देवता सुर - जो सुर में है।
राक्षस, असुर- जो बेसुर हैं।
मतलब साफ है। आपको अब अपनी भूमिका स्वयं ही तय करनी हैं। मित्रों... आप इस ग्रह के राजकुमार हैं। आप सभी की जय हो। मेरी यही मनोकामना हैं। यह आत्मआदेश से आप सभी को लिखा हैं। जिससे आपको आपका महान और चक्रवर्ती परिचय प्राप्त हो।
मुझे इस ग्रह से सिवाय आप सभी के सम्मान के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए।
मैंने ऐसे आदमी की लाश देखी हैं जिसे दफनाते ही कब्रिस्तान की मृत्यु हो गयी। मैं ऐसे श्मशान देख रहा हूं जिनमें शव जलाते ही श्मशान जल जाते हैं।
यह कविता हमें कुछ कह रही है...
अहंकार हमारा है आदमजात
सदियों से ब्रह्माण्ड में
घूमती पृथ्वी में
घूमता रहा आदमी
देश-परदेश
और एक प्राचीन सुबह
अहंकार उसका उठकर
चिल्ला पड़ा जोर से
मैने सारी धरती घूम ली
सदियों से अपनी धुरी पर
और परिधि में घूमती पृथ्वी पर
खडेÞ-खड़े आदमी
उस प्राचीन सुबह यह मूर्खता कर बैठा
और तब से सर पकड़कर बैठा है
धम से जमीन पर
बुढ़ा होकर मृत्यु को प्राप्त होने...
उस प्राचीन दिन की वह प्राचीन सुबह
प्राचीन गलती की थी उस प्राचीन आदमी ने
और सजा समूची सृष्टि का मिली हैं
पेड़-पौधे-पक्षी-जानवर-ग्रह-अंतरिक्ष, श्मशान-कब्रिस्तान सभी मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं....
बूढेÞ होकर मर रहे हैं....
पर मैं जानता हूं
ईश्वर ने तो आशीर्वाद दिया था हमें बडेÞ होने का
बूढेÞ होने का नहीं
पर अहंकार ने हरण कर लिया हैं
हमारा वह चिर यौवन
जैसे साकार पुष्प में
बैठी उस निराकार खुशबू को अगर अहंकार हो जाता तो गजब हो जाता
फूल खिलते और बूढ़े हो जाते
और बूढे फूलों में भरी यह धरती
कितनी डरावनी लगती हमारे बच्चों को
जैसी कि आज लगती हैं
बच्चों से भरी यह धरती
शव यात्राओं के पीछे चीखें मारती
भागती अपने वृद्धों के शवों के पीछे... —रविदत्त मोहता
Sunday, March 7, 2010
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