संसार जब किसी मनुष्य के हृदय मे ‘‘न्यास याने ट्रस्ट’’ हो जाता है तो उसे ही ‘सन्यासी’ कह देते हैं। किसी मनुष्य के लिए संसार का न्यास में ट्रस्ट में बदल जाना ही सन्यास है। अत: मनुष्य संसार को धर्म से नहीं बल्कि इसका ‘न्यासी’ हो जात है। ट्रस्टी हो जाता है। इसी कारण गांधी जैसा साधारण व्यक्ति सच्चे अर्थाें में राष्टÑपिता बनकर भी सन्यासी था। महात्मा है।
लेकिन इस वैज्ञानिक युग में मनुष्य मात्र किताबी चेतना से सच को समझने का प्रयास कर रहा है। यही उसके पतन का कारण है। शास्त्र और ग्रंथ तो मार्ग हैं। इन पर चलकर मनुष्य सत्य के द्वार पर पहुंच जाता है। लेकिन द्वार तो स्वयं को ही खोलना पड़ता है। अत: क्लेश ‘संसार’ और ‘संसार’ और ‘संन्साय’ के बीच नहीं हैं। झगड़ा तो मनुष्य की समझ के जिद्दी हो जाने से है।
अगर हम करुणा के उत्तरदायी सिंहासन पर बैठाकर दुनिया को देखेंगे तो समूचा जगत हमें हमारे घर से निकलता और घर में ही प्रविष्ट होकर विकसित होता दिखाई देगा। लेकिन अगर हम दूसरे के घर से सत्य का द्वार आरंभ करते है तो वह मनुष्य द्वारा लिखा जाने वाला साहित्य हो जाता है। संसार से ज्यादा महान सन्यास है। मनुष्य का इस संसार का न्यासी हो जाना ही सन्यासी हो जाना है। यही अध्यात्म का परम विकास है। यही अतिमानवता हैं।
रविदत्त मोहता
Monday, November 2, 2009
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