Sunday, April 4, 2010

भविष्य पुराण

हमारी दुनिया में भगवत्ता का धार्मि्रकीकरण हो रहा है.. कि जैसे भगवत्ता कोई धार्मिक और शारीरिक वर्जिश का क्षेत्र हो। आसन, प्राणायाम, साधना और पूजा आदि हमें भगवत्ता के प्रांगण में पहुंचाती तो है लेकिन यह भगवत्ता नहीं है। मात्र धार्मिक क्रियाएँ हैं।
मैं कहना चाह रहा हूँ कि इस पृथ्वी को विकृत मात्र योग्य व्यक्तियों ने ही किया है। प्रतिभाशाली व्यक्ति तो इस पृथ्वी मां का पुत्र बनकर जन्म लेता है जीवन जीता है। सो अगर भारत को पृृथ्वी पर पुन: अपना मुकुट धारण करना है? तो उसे अपनी चेतना में नवीन विस्फोट करने होंगे। ये सूर्यमुखी विस्फोट प्रवचनों के उद्घोषों से, गुफाओं, मठों और आश्रमों में रहकर नहीं किए जा सकते। क्योंकि वहां अतीत की धार्मिक पादुकाएँ हैं। तस्वीरें हैं। व्यास पीठें हैं। ये स्थान श्रद्धा तो पैदा कर सकते हैं। लेकिन फिर कुछ समय के बाद ईश्वर को श्रद्धांजलि भी अर्पित कर देते हैं। इधर भगवान यानि सत्य किसी मानवीय श्रद्धांजलि का मोहताज नहीं है। कोई भी स्वर्गीय तस्वीर हमारे बहुमूूल्य जीवन में सत्य का नया डीएनए पैदा नहीं कर सकती। वर्तमान सत्य की देह है। कर्म इस देह की आत्मा है।
आज ही अब को गले लगा सकता है। क्योंकि आज और अब दोनों उपस्थित हैं - अध्यात्म की देह में। पृथ्वी पर। युग में। इसे अब आप यूं समझें, अगर सुदूर ब्रह्माण्ड में महा अकेले सूर्य के गर्भसाल में लगातार विस्फोट नहीं होते रहें..आज और अब तथा अभी-अभी न होते रहें तो क्या हम जीवित रह सकते हैं? थिंक इट? सूर्य का गर्भाशय क्रमिक विकास का जीता-जागता प्रमाण है। क्रमिक विकास गर्भस्थल में ही होता है। मनुष्य का गर्भस्थल चेतना का डीएनए है मेडिकल साईन्स का डीएनए शारीरिक स्तर तक ही सीमित है। लेकिन आध्यात्मिक डीएनए चेतना के स्तर पर होता है। इसलिए पहले चेतना का डीएनए विकसित होता है। फिर यहीं विकसित चेतना शरीर को विकसित करने का कारण बनती है। बॉडी डीएनए विकसित होता है।
तो अगर बहुत सामान्य भाषा में कहा जाये तो उचित होगा कि पृथ्वी पर अगर कहीं महेन्द्र पैदा होता है- तो उसे पूरा महेन्द्र बनने का अवसर प्रदान किया जाये। अगर कल्लू पैदा हो तो उसे कल्लू ही बनने का सहयोग प्रदान किया जाये। क्योंकि अगर हमने उसे गांधी, बुद्ध, राम, कृष्ण, दयानन्द, अरविंद आदि बनने को बाध्य किया तो हमारे द्वारा अनजाने में किसी माता के दुलारे महेन्द्र और कल्लू की हत्या हो जायेगी। अतीत का विकृत फोटोजेनिक पुनर्जन्म होता चला जायेगा। यह पुर्नजन्म विकास नहीं होता। आध्यात्म नहीं होता। संक्राति नहीं होती। धर्म हो जाता है। परिणामत: इस धरा पर भगवान का जन्म नहीं हो सकेगा। दसवें अवतार हिन्दू संस्कृति के मतानुसार श्री कल्कि को ्रप्रकट होने में देरी होगी। कारण हम ही होंगे क्योंकि गीता में श्री कृृष्ण कह गये हैं कि जो जिस प्रकार मेरा भजन करता है-उसे ठीक उसी प्रकार का मैं प्रत्युत्तर देता हूँ। क्रमश:
भगवान हर युग में अपनी मौलिक प्रतिभा से प्रकट होते हैं। नवीन योग द्वारा पृथ्वी पर अट्टाहास करते हुए हँुकार भरते हैं- ये योग है... जिसे मैने सूर्य से कहा था...
अत: अगर हमने अतीत के धार्मिक भोग का क्रम जारी रखा तो प्रकृति अपनी विनाशलीला से हमें अपने पांवों पर खड़ा करके ही दम लेगी। क्योंकि पृथ्वी और प्रकृति सगी बहनें हैं। पृथ्वी मॉं को स्वास्थ्य प्रकृति बहन से ही प्राप्त होता है। और प्रकृति अपनी कालजयी बड़ी बहन पृथ्वी को अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करने के लिए अपने गर्भ में कई विनाशकारी भूकंप पैदा कर सकती है। साथ ही अंतरिक्ष से भी कोई आपदा हम तक पहुँच सकती है। क्योंकि हम भी अंतरिक्ष में ही रहते हैं। पृथ्वी भी अंतरिक्ष में ही लटकी हुई अपनी धुरी पर घूम रही है। इधर ब्रह्माण्ड अपने उत्तरोत्तर विकास में पृथ्वी को भी अपने साथ लिए सहज गति से आगे...और आगे फैलता जा रहा है....
एक कविता से अपनी बात स्पष्ट कर रहा हूँ-
भूमि का कोई स्वभाव नहीं होता।
यह मात्र उपजाऊ होती है।।
बीज का स्वभाव होता है।
पर उपजाऊ नहीं होता।।
गुलाब का बीज
भूमि में मिलकर
गुलाब ही पैदा करता है।
भूमि पैदा नहीं करता।
इस तरह बीज योग है।
पर भूमि अतीत है।।
तो अगर रेत में
रेत का बीजारोपण करेंगे...
तो रेत ही पैदा होगी।।
यह रेत योग नहीं है
अतिमानवता नहीं है।
भोग है।।
बीज योग है।
अतिमानवता है।।
भगवान है।।
यदा-यदा ही धर्मस्य है।।
तो संकट बीज का है ।
आज पूरा विश्व ही एक विश्वग्राम में बदल चुका है। मुझे याद आता है कि हमारे एक श्रद्धेय स्वामी जी हैं। आपने प्रभु प्रेरणा से भारत माता मंदिर बनवाया है। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ इस कारण उनसे खुलकर बातचीत भी कर लेता था। मैं जब हरिद्वार उस मंदिर में गया तो मैं भारत माता से मिलना चाहता था। लेकिन बहुत गहरा ध्यान करने पर भी मुझे उस महान मंदिर के प्रांगण में भारत माता के दर्शन नहीं हुए। मैं निराश लौट आया।


यहां मैं एक रहस्य और उद्घाटित करना चाहता हूँ। वह यह है कि अतिमानव के प्रकटीकरण के लिए महर्षि अरविंद को सभी देवताओं ने सहायता करने को फिलहाल मना कर दिया था। मात्र मेरे गुरू श्री कृष्ण ही थे- जिन्होंने श्री अरविंद से कहा- तुम आगे बढो मैं आनंद के माध्यम से तुम्हारी सहायता करूंगा। यहां मैं आपको यह भी बतला दूं कि अतिमानस इतना कठोर है कि मनुष्य उसका स्पंदन तक सहन नहीं कर सकता। अगर श्रीकृष्ण अपनी आनंदकला से मनुष्य उसका स्पंदन तक सहन नहीं कर सकता। अगर श्रीकृष्ण अपनी आनंदकला से मनुष्य की सहायता न करें। अतिमानस बहुत कठोर, कसैला और अपने स्वभाव से टस से मस नहीं होने वाली प्रकृति का है। यह पहली बार पृथ्वी की ओर आया है....
तो यहां यह स्पष्ट होता है कि असत्य की विजय का उद्घोष भी भावनात्मक स्तर का है। भावुक दृष्टिकोण है। क्योंकि सत्य को असत्य के कारण क्योंकर सक्रिय होना चाहिए? दूसरे शब्दों में जन्म लेना चाहिए। मैं आप सभी के सामने चिंतन के लिए एक प्रश्न छोड़ता हूँ- सत्य को मात्र सत्य की स्थापना के लिए क्यों नहीं जन्म लेना चाहिए? मेरे विचार से तो सतयुग की स्थापना तभी हो सकती है।
तो मेरी प्रार्थना है कि दसवें अवतार श्रीकल्किजी का अब मात्र सत्य के कारण सत्य की स्थापना के लिए अब अवतार लेना चाहिए। हमारी प्राचीन अवतार प्रणाली में भी संशोधन की आवश्यकता है। इसलिए अतीत एक भावुक अवतार है। अतीत की स्तुति आतंक कैसे बनती है? आइये अब इसे समझते हैं।
परम्परा के मतानुसार सृष्टि की सबसे सुन्दर कृति मनुष्य है। यह भी कहा जाता है कि इस सुन्दर कृति को बनाने वाला ईश्वर इससे भी अधिक सुन्दर है। परन्तु परम्परा के विचारकों और सन्यासियों ने मनुष्य और ईश्वर के क्रमिक विकास को अवरूद्ध करके रख दिया है। विचारकों ने अपने दार्शनिक विचारों के आधार पर इस सुन्दरता पर किताबें लिख कर, इस जैविक सुन्दरता को जड़ बना डाला है। इसी कारण विभिन्न दार्शनिक मतावलियां जगत में पैदा हो गयी हैं। सन्यासियों ने अपनी-अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को मंन्दिरों, मस्जिदों, गुरूद्वारों और गिरजाघरों आदि में बदलकर परमसत्य को इसमें कैद करके रख दिया है। इस कारण एक प्राकृतिक सत्य स्थूलता में बदल गया है। आचरण उच्चारण में बदल गया।
इधर एक हस्तक्षेप पार्थिव जगत में विज्ञान के माध्यम से हुआ है। विज्ञान ने इन दोनों ही सत्यों मनुष्य और ईश्वर को नकारकर एक नये धर्म का बीजारोपण किया। इसे कहा तो विज्ञान गया, परंतु यह धर्म का ही छद्म रूप है। यहां मैं यह जरूर स्पष्ट करना चाहूँगा कि जब हम किसी सत्य कोे नकार कर आविष्कार करते हैं तो यह नक्कारखाने की तूती बन जाता है। धर्म बन जाता है। इसलिए अल्बर्ट आइंसटिन ने अपनी मृत्युशैया पर स्वयं को एक साइंटिफिक सेंट की तरह याद किये जाने की अंतिम इच्छा व्यक्त की थी।
तो शनै:-शनै: विज्ञान की आविष्कारिक और खोज परक प्रकृति के कारण एक और हस्तक्षेप भी पार्थिव जगत में हुआ। इसे आर्थिक शक्ति कहा गया। इस नवीन आर्थिक धर्म के मानने वालों ने कहा कि सबसे बड़ा धर्म है- आर्थिक ऐश्वर्य। इसी कारण पूरा विश्व एक ऐसे वायरस में पीड़ित हो गया जिसे छोड़ा भी नहीं जा सकता और अपनाया भी नहीं जा सका। यानि धीरे-धीरे समझ में यह आता है कि यह दुनिया धार्मिक ही होती चली गई। वह भी जड़ धार्मिक।
इस तथ्यात्मक विवेचन के बाद प्रश्न यह खड़ा होता है कि मानव जगत का संकट क्या है? तो फिर दूसरा प्रश्न यह खड़ा होता है कि मानव को परेशानी क्या है?
वस्तुत: धरती पर मानव की उत्पत्ति के युग को पाषाण युग कहा जाता है। यानि जब ईश्वर ने धरती पर मनुष्य तो यहां पाषाणों का आधिक्य था। पाषाणों से बने गहनें, बरतन और हथियार ही मनुष्य के जीवित रहने के एक मात्र साधन थे। चंूकि दा काल की चेतना भी पाषाणी यानि जड़ थी। इस कारण मनुष्य एक बेबसी में घिर गया। उसका विकास अपनी इस महाबेबसी के कारण रूक गया। अत: वह एक सुरक्षात्मक जीवन जीने लगा। कारण कि उस युग में मौत का खतरा प्रति क्षण मनुष्य के आगे रहता था। अत: यहीं से मानव चेतना में डर और भय की वजह से अंधकार की शक्ति का हस्तक्षेप हुआ। और बेबसी के कारण धर्म नामक स्पन्दन का जन्म हुआ। यह मानसिक स्पन्दन अंधेरे की शक्ति का प्रभाव था। इसी कारण मनुष्य धर्मभीरू होता चला गया। और आज हालात यह है कि दुनिया का सबसे विकसित राष्टÑ अमेरिका भी उस एक मत का सहारा लेता है- जिसे कई हजार वर्षो पूर्व किसी परिपक्व शिखर पुरूष ने मनुष्य के तात्कालिक खतरों को दूर भगाने के लिए प्रकट किये थे।
तो मूलभूत समस्या मानव के मानसिक और हार्दिक प्रांगण में ठहर कर रूक जाना है। ठिठक कर ठहरा हुआ पानी जिस तरह बदबूदार और गंदा नाला बन जाता है ठीक इसी तरह कई हजार वर्षो का ठहरा हुआ विश्वास और अनुभव भी बदबुदार और कीटाणुयुक्त हो गये हैं। इससे मानव के मानसिक और हार्दिक प्रांगण को कई बिमारियों ने घेर लिया है... क्यों? क्योंकि कुछ लोग परमसत्य को एक अति प्राचीन उद्घोष वेद के नाम से स्थापित करना चाहते हैं। तो वहीं कुछ इस स्वप्न को अपनी परम्परा के मतानुसार बाईबल, कुरान या गुरूग्रंथ साहब नामक पवित्र शस्त्रों के आधार पर स्थापित होता देखना चाहते हैं। इधर हाल में भारत में बहुत धार्मिक अभियान पिछले पचास साठ वर्षो में आरंभ हुए हैं।

Saturday, April 3, 2010

भविष्य पुराण

ऐसा क्यों हो रहा है?
मैं आध्यात्मिक स्तर से अपनी बात समझाने का प्रयास करूंगा। इसीलिए मैंने अपने इस शोध पत्र को दो भागों में बांट दिया है।
पहले हम भगवत्ता को समझने का प्रयास करेंगे। इसके बाद आतंकवाद के कारणों की जड़ पर प्रकाश डालकर इसे समझने का प्रयास करेंगे।
भगवत्ता का अर्थ क्या है?
-मैं योग को ही भगवत्ता मानता हूँ।
तो फिर योग का अर्थ क्या है?
मेरे मतानुसार योग का अर्थ है अतीत में वर्तमान को जोड़कर भविष्य का सृजन करना। आधुनिक कुछ नहीं होता। अतीत में ही नया जब जुड़ जाता है तो वह आधुनिक बन जाता है। जैसे पति में जब पुत्र जुड जाता है तो वह पति से पिता हो जाता है। पिता हो जाने पर कोई मनुष्य पति होने से महरूम नहीं किया जा सकता। और पति होने पर किसी का भाई होने का अधिकार उससे नहीं छीना जा सकता। भविष्य भी हमेशा अतीत के पेट से ही जन्म लेता है।
फिर भविष्य क्या है?
-आगे बढना..क्रमिक विकास..
गीता में भगवान श्री कृष्ण अपने मनुष्य सखा अर्जुन से कहते हैं-ये योग है...जिसे मैने सूर्य से कहा। सूूर्य ने मनु से कहा और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा। पर काल के गाल में यह विस्मृत हो गया है.. और हे मनुष्य श्रेष्ठ अर्जुन.. इस योग को मैं तुम्हें पुन: याद दिलाता हूँ..
तो यहां भगवान श्री कृष्ण यह कह रहे हैं कि जब-जब भगवान की भगवत्ता को विस्मृत किया जाता है। तब-तब भगवान इसे याद दिला के विकसित करने के लिए प्रकट होते हैं। यहां श्री कृष्ण ने सोग का अर्थ यह स्पष्ट नहीं किया है कि हमें अतीत को याद रखना है। अतीत की स्तुति करनी है। अतीत का ही भोग करना है। बल्कि श्री कृष्ण ने तो स्वयं अपने सम्पूर्ण जीवन काल में कभी भी अपने किसी अतीत अवतार रूप का सहारा नहीं लिया। बल्कि स्वयं अपना ही सहारा लिया... और सत्य भी है। श्री कृष्ण ने अर्जुन से यह नहीं कहा कि यह भगवान श्री राम के नाम पर युद्ध लडे। बल्कि सीना ठोक कर कहा कि ऐसा वे यानि श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं इसलिए युद्ध लड़ा जाये। युद्ध श्री कृष्ण के नाम से लड़ा जाये।
क्रमश:

Friday, April 2, 2010

भविष्य पुराण

अरस्तु ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इस सामाजिकता की वजह से ही विगत शताब्दियों में कई क्रान्तियाँ हुई..। लेकिन हमने इन क्रांतियों को धराशायी होते भी देखा है। रूस की कम्युनिस्ट विचारधारा अव्यावहारिक हो गयी, क्योंकि इसमें अधिकार को विरोध द्वारा प्राप्त करने का प्रावधान था। जड़ता भी थी। इधर कई देश स्वतंत्र होने के बाद अपने ही देशवासियों द्वारा गुलाम बना लिये गये। यानि घर के दीपक ही घर को जलाने लगे। दीपकों की कतार श्मशानों, कब्रिस्तानों और शवों के सिरहाने सजायी जाने लगी। बाड़ ही खेत को खाने लगी।
तो प्रश्न यह उठता हैं कि मूल्य लगातार टूटते क्यों चले गये? मान्यताएं लगातार इतने बलिदानों के बावजूद भी असफल क्यों होती चली गयी? हालांकि अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पर यह सामाजिक प्राणी इतना असामाजिक क्यों होता चला गया? प्र्रश्न गम्भीर है। समझता हूँ कि यह एक गम्भीर विश्लेषण भी चाहता है।
मुझे यह कहने में कोई संकोच महसूस नहीं होता कि मनुष्य ने अपने स्वभाव पर गम्भीर चिंतन नहीं किया है। हमने मानव जीवन को ड्रार्इंगरूम समझ लिया है। अहंकारवश हम इसमें भावुक विचारधाराओं का श्रृंगार करने लगे हैं... हालांकि हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि कोई भी घर उसकी दीवारों से नहीं जाना जाता बल्कि उससे तो वह केवल मकान कहलाता है। घर के मायने हैं उसमें रहने वाले लोग।
ठीक यही गलती हमने मानवदेहरूपी घर के साथ की है। हमने शरीर को दीवार बना डाला है। अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पश्चिम कहता है कि मनुष्य आर्थिक प्राणी है। भारत कहता है कि मनुष्य एक धार्मिक प्राणी है। पर मैं कहता हूँ कि मनुष्य जन्मजात आध्यात्मिक प्राणी है। मैं डार्विन से बहुत प्रभावित हूँ क्योंकि डार्विन का विकासवाद का सिद्धान्तत इतना प्राकृतिक है कि इसको नकारा ही नहीं जा सकता।जब कभी भी मैं बहती नदी को देखता हूँ। उसकी पवित्रता और शीतलता को अपने गले से जिगर में उतारता हूँ तो महसूस होता है कि कहीं ऐसा न हो कि मेरा पेट एक कुंआ बन जाये, और इसमें नदी का पानी अपने स्वाभावनुकूल परिस्थितियाँ ना पाकर क्रांति कर दे? शायद यही सोचकर ईश्वर ने हमारे शरीर में नौ दरवाजे रख छोडे हैं जिनसे गति का सर्पिल विकास निरंतर बना रहे... आंख, नाक, मुंह, मलद्वार आदि ये सभी शरीर के द्वार हैं। दीवार नहीं हैं। जैसे कि मैने पूर्व में कहा कि मनुष्य एक आध्यात्मिक प्राणी है। मनुष्य का शाश्वत स्वभाव भगवत्ता है। पर आज मनुष्य अपने मूल स्वभाव भगवत्ता को विकृत कर जाति से ही आतंकवादी बन रहा है... क्रमश:

Sunday, March 7, 2010

पृथ्वी का अस्तित्व बचाने की जिम्मेदारी हैं हम सबकी

मानव इतिहास की कोहरे से भरी गुफाओं में घुसकर मैंने पूर्वजों से बाते की है। मैंने उन्हें सुबकते और सिहरते हुए देखा हैं। शब्द रूपी चक्र अपनी पांच अंगुलियों में धारण करने वाले आप सभी तो वसुदेव कृष्ण हैं, लेकिन इतिहास मुझे कहता हैं कि आप सभी इस पृथ्वी भूखण्ड के सबसे गरीब और कमजोर प्राणी है।
क्यों?
क्योंकि हम शब्दों की शक्ति को पहचान नहीं पाये। हम लेखक बने रहे। स्वयं शब्द नहीं बने। जबकि शब्द ब्रह्म हैं।
इसे मंै अच्छी तरह जानता हूं- इसलिए लिख रहा हूं कि इस पार्थिव जगत में शब्द या तो राजसिंहासनों को प्राप्त करने के लिए बोला गया। या राजाओं की चाटुकारिता के लिए लिखा गया हैं। ये दानों प्रकार के शब्द जब प्रयोग में लिये जात हैं, तो नष्ट हो जाते हैं।
जैसे कि हमारा यह शरीर है। यह भी सदियों से ऐसा कर रहा हैं। इसलिये नष्ट हो रहा है। एक प्राचीन चीज आपसे बांटना चाहता हूं -
सृष्टि के निर्माण से पूर्व शब्द नहीं था। स्वर था। स्वर जब पक कर सुर बना तो शब्द का जन्म हुआ। अर्थात सुर के गर्भ से शब्द का जन्म हुआ। और इन्हीं शब्दों के गर्भ से देवताओं का जन्म हुआ। ये देवता स्वभाव से ही स्वर में थे। इसी कारण वायुदेव से वायु, पृथ्वी देव से पृथ्वी, अग्नि देव से अग्नि और जलदेव से जल की उत्पत्ति हुई। परंतु ध्यान में रखने की बात यह है कि ये पांचों तत्व अपने स्वर में रहने के कारण ही आत तक ताजे हैं। सुर में होने के कारण अभी तक ब्रह्माण्ड में सुरक्षित और अक्षय हैं।
मेरे पूर्वजों....ब्रह्माण्ड एक प्राचीन स्वर में अपना विस्तार कर रहा है। इस कारण वहां असुरता का अस्तित्व तत्काल मिटा दिया जाता है। क्यों कि इस ग्रह पृथ्वी पर हमारा कर्म और शरीर अभी तक बेसुरा है। अमरता को प्राप्त वरदान के बावजूद भी करोड़ों वर्षो बाद भी हम सभी मरणधर्मा हैं। हम बेसुरे होने के कारण मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं।
मंै आपको सच कहता हूं कि अगर इस पृथ्वी में से शब्द को हटा दें तो यह समूची पृथ्वी ताश के पत्तों की तरह धड़ाम से ब्रह्माण्ड के आंगन में गिर पडेगी। नष्ट हो जायेगी।
कैसे?
आइये इसे समझते हैं।
पहले देवताओं का अस्तित्व नष्ट हो जायेगा।
देवताओं के अस्तित्व के नष्ट होने से पृथ्वी का सुर नष्ट हो जायेगा। पृथ्वी के सुर के नष्ट होने से ये पृथ्वी नष्ट हो जायेगी। और यह समूची सृष्टि मात्र पृथ्वी में शामिल सभी जीव पुन: ब्रहÞमाण्ड के महास्वर में विलीन हो जायेगी।
तब? ये राजसिंहासन, ये धन, प्रसिद्धि, ये सब नष्ट हो जायेंगे। हम पुनर्जन्म भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे, क्योंकि वैसी पृथ्वी बनने से फिर ब्रह्माण्ड के महास्वर को समय लगेगा। फिर स्वर पक कर सुर बनेगा। सुर के गर्भ से शब्द जन्म लेगा। यह प्रजनन पुन: आरंभ होगा।
मेरे भाइयों... मैं इसे जानता हूँ इसलिए आपको लिखता हूं कि शब्द के महत्व और शक्ति को पहचानों। आप सभी पर पृथ्वी के अस्तित्व की रक्षा का भार है। कालजयी शब्द ब्रह्म बनकर ही लिखा जा सकता है। बोला जा सकता हैं। जब आप स्वयं याब्द हो जाते हैं तो ब्रह््माण्ड हो जाते हैं। शब्द ही शस्त्र बनकर अभिशाप हो जाता हैं। संहारक हो जाता हैं। ब्रह्मास्त्र हो जाता हैं।
मेरे निराकारो...शब्द ही वंश है स्वर का। स्वर वंश है ईश्वर का। शब्द एक निराकार सत्ता हैं। क्योंकि इसकी उत्पत्ति ब्रह्माण्ड के निराकार स्वर से होती हैं।
हम कालजयी बनकर ही कालजयी साहित्य की रचना कर सकते हैं। मृत्यु को प्राप्त हो रही इस पृथ्वी को बचा सकते हैं। इसलिए अब हमें यह जिम्मेदारी उठानी है।
जिम्मेदारी को अपने पिता की अर्थी की तरह मत उठाओ बल्कि अपनी लाडली पुत्री की डोली की तरह अपने कांधो पर धारण करो।
मैं समझता हूं कि अब आम सुर और असुर को समझ गये होंगे। पुराणों में जिन राक्षसों यानि असुरों और जिन देवताओं याने सुरों का जिक्र आता है। वे कौन हैं? आप समझे कि नहीं? अच्छा मैं समझाता हँू।
देवता सुर - जो सुर में है।
राक्षस, असुर- जो बेसुर हैं।
मतलब साफ है। आपको अब अपनी भूमिका स्वयं ही तय करनी हैं। मित्रों... आप इस ग्रह के राजकुमार हैं। आप सभी की जय हो। मेरी यही मनोकामना हैं। यह आत्मआदेश से आप सभी को लिखा हैं। जिससे आपको आपका महान और चक्रवर्ती परिचय प्राप्त हो।
मुझे इस ग्रह से सिवाय आप सभी के सम्मान के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए।
मैंने ऐसे आदमी की लाश देखी हैं जिसे दफनाते ही कब्रिस्तान की मृत्यु हो गयी। मैं ऐसे श्मशान देख रहा हूं जिनमें शव जलाते ही श्मशान जल जाते हैं।
यह कविता हमें कुछ कह रही है...
अहंकार हमारा है आदमजात
सदियों से ब्रह्माण्ड में
घूमती पृथ्वी में
घूमता रहा आदमी
देश-परदेश
और एक प्राचीन सुबह
अहंकार उसका उठकर
चिल्ला पड़ा जोर से
मैने सारी धरती घूम ली
सदियों से अपनी धुरी पर
और परिधि में घूमती पृथ्वी पर
खडेÞ-खड़े आदमी
उस प्राचीन सुबह यह मूर्खता कर बैठा
और तब से सर पकड़कर बैठा है
धम से जमीन पर
बुढ़ा होकर मृत्यु को प्राप्त होने...
उस प्राचीन दिन की वह प्राचीन सुबह
प्राचीन गलती की थी उस प्राचीन आदमी ने
और सजा समूची सृष्टि का मिली हैं
पेड़-पौधे-पक्षी-जानवर-ग्रह-अंतरिक्ष, श्मशान-कब्रिस्तान सभी मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं....
बूढेÞ होकर मर रहे हैं....
पर मैं जानता हूं
ईश्वर ने तो आशीर्वाद दिया था हमें बडेÞ होने का
बूढेÞ होने का नहीं
पर अहंकार ने हरण कर लिया हैं
हमारा वह चिर यौवन
जैसे साकार पुष्प में
बैठी उस निराकार खुशबू को अगर अहंकार हो जाता तो गजब हो जाता
फूल खिलते और बूढ़े हो जाते
और बूढे फूलों में भरी यह धरती
कितनी डरावनी लगती हमारे बच्चों को
जैसी कि आज लगती हैं
बच्चों से भरी यह धरती
शव यात्राओं के पीछे चीखें मारती
भागती अपने वृद्धों के शवों के पीछे... —रविदत्त मोहता

Saturday, January 30, 2010

एकांत मेरा धर्मशास्त्र हैं

रविदत्त मोहता
जोधपुर। मैंने गुप्त आकाश में मुख से सुना है कि धरती पर उपस्थित सभी प्राणी अपने अपने सिर ऊपर उठाये हुए है क्योंकि आकाश ने अपना सिर इन सबके लिए पृथ्वी पर नीचे झुकाया है। अगर कभी आप आकाश को अपनी इन दोनों आंखों से पूर्णत्व में देख पायें तो आप देखेंगे कि पृथ्वी पर झुका हुआ यह आकाश एक कबूतरी की तरह पृथ्वी अण्डे को अपनी गर्मी से लगातार सै रहा है. .. इसी कारण इस पृथ्वी अण्डे से यह चराचर जगत पैदा हो रहा है। और आकाश ही अपनी गर्मी से इसे पाल पोसकर बड़ा कर रहा है। हम मात्र सूर्य की गर्मी से ही जीवित नहीं हैं। बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की गर्मी से अभी तक अस्तित्व में सुरक्षित है। मैं कभी भी उस चेतना को समझ नहीं पाया जिसने किसी एक टुकडेÞ को ही सत्य माना। सत्य न तो विभक्त है। न ही भक्त है। सत्य तो अखिल अस्तित्व में व्यक्त है। यह व्यक्त ही व्यक्ति होकर कभी राम तो कभी कृष्ण होता है। और ये राम और कृष्ण ही वक्तत्व होकर रामायण और गीता हो जाते हैं। जिस रामायण और गीता को हम श्रीराम और श्रीकृष्ण की कह रहे हैं वे तो उस अव्यक्त के व्यक्त होने का वक्तत्व है। ब्रह्मांड में वक्त का अस्तित्व नहीं होता। वहां मात्र व्यक्त का अस्तित्व होता है। ब्रह्मांड का एक सूर्य ही पृथ्वी समुद्रों से पानी उठाकर आकाश को पहुंचा देता है। आकाश क्या है? पृथ्वी का ही हिस्सा। लेकिन ध्यान रखें कि आकाश और ब्रह्मांड मेें बहुत फर्क है। ब्रह्मांड का पृथ्वी के आकाश से कोई लेना देना नहीं है। ब्रह्मांड में पृथ्वी तो मात्र चिड़िया का एक छोटा सा अण्डा है। इसे ब्रह्मांड अपने पेट में धारण किये हुए है। पृथ्वी पर वर्षा पृथ्वी के आकाश से होती है। ब्रह्मांड से कभी भी पानी की वर्षा नहीं हो सकती, क्योंकि वहां पांच तत्व हैं ही नही। इस धरती पर जितना भी खेल चल रहा है। लीला चल रही है- वह धरती की सीमा में ही चल रही है। इसलिए इस सीमा में रहने वाली चेतना इसी सीमा में मरणधर्मा है। यह पार्थिव चेतना पृथ्वी की गति के साथ साथ ही ब्रह्मांड में पृथ्वी की तरह गोल गोल अण्डाकार अपनी धुरी और परिधि में घूमने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती। इसी कारण मानव विकास का गौरव पथ अवरूद्ध हो गया है। मानव शब्द का नव आज भी अपनी मां के होते हुए मानव नहीं हो पाया है। सच्चा और पवित्र विकास नहीं कर पाया है। एक प्राचीन अलौकिक घटना में द्वापर युग के मुख द्वारा आपको समझाना चाहता हूं। माता यशोदा को कन्हैया ने जब अपना मुख खोलकर दिखाया तो माता यशोदा उसमें अखिल ब्रह्मांड के ग्रह नक्षत्रों, अरबों खरबों तारों के बनने और बिखरने को देखकर मारे डर के बेहोश हो गई। यही घटना मैंने भी बचपन में अपनी पड़दादी मां से कहानियों में सुनी है। परंतु हमने इस घटना के तत्व को छोड़ दिया और कन्हैया के मुख को पकड़कर बैठ गये। श्रद्धा होती ही ऐसी है।
यह तत्व नहीं पकड़ती बस स्थूल को ही पकड़कर बैठ जाती है। इस घटना के माध्यम से ब्रह्मांड पहले ही हमें यह संदेश कन्हैया के बालमुख से दे गया था कि एक दिन वह इस कन्हैया के मुख से द्वापर युग के आमुख के उद्बोधन देगा। गीता ब्रह्मांड उद्बोधन का ही संबोधन है। दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं। जिसमें आप सत्य के आर पार देख पायेंगे। गीता में एक श्लोक आता है। वृष्णीनां वासुदेवोउस्मि पाण्डवानां धनंजय:।
मुनीनामप्यहं व्यास: कवीनामुशना कवि:।।
यह श्लोक अद्भुत है। यहां निराकार ने अपना चेहरा दिखा दिया। लेकिन कमाल यह है कि यह भी कह गया- मैं ये नहीं हूं। यानि जब वह निराकार चेतना यह कहती है कि- वृष्णियों में मैं याने वासुदेव श्रीकृष्ण हूं, पाण्डवों में धनंज्य अर्जुन हूं, मुनियों में व्यास और कवियों में उशना कवि हूं। तो इसका मतलब यह हुआ और साफ साफ दिखाई देता है कि श्रीकृष्ण के मुख से जो बोल रहे हैं, वे यह घोषणा कर रहे हैं कि वे न तो श्री विष्णु हैं, और न ही श्रीकृष्ण है। अर्थात यह अजन्मा अपने होने का सबूत तो देता है- परंतु स्वयं पर ज्यादा बात करना पसंद नहीं करता। अता पता बताता है- परंतु अपना पिनकोड नम्बर नहीं बताता है। ब्रह्रमांड एक पिनकोड रहित सत्ता है। न तो कोई इसे डी-कोड कर सकता है। और न ही इसका कोई एसटीडी कोड नम्बर है। यह तो मात्र अपनी मर्जी से आवश्यकतानुसार युग मुखों और मानवमुखों से शब्द के माध्यम से मुर्खारत होता है। शब्द ब्रह्म है- यह स्वर्णमयी पंक्ति 100 प्रतिशत सच्ची और प्रमाणिक है। यहां मैं अपनी बात और स्पष्ट करने के लिए आपके सामने एक उदाहरण रखना चाहता हूं। कृपया आप इसे समझे। महाभारत के उस महाभयानक युद्ध के बाद श्रीकृष्ण बहुत चुप चुप रहने लगे थे। उनका ज्यादातर समय जंगलों की सुनसान पगडण्डियों पर अकेले घुमते हुए बीतता था। अपने जीवन की इस अंतिम वेला में उनके पास उद्धव का निकटतम प्रवास रहा। एक दिन श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को एक विशेष संदेश देने के लिए बुलाया। उद्धव भी उन दिनों बहुत डरे डरे रहते थे। कारण यह था कि श्रीकृष्ण का इस तरह चुप चुप रहना उन्हें चिंतातुर करता था। तो श्रीकृष्ण और उद्धव जंगल में पुन: मिले। एक पेड़ की छांव में दोनों खड़े थे। श्रीकृष्ण पेड़ के तने से अपना तन लगाकर खडेÞ हो गये और उद्धव उनके सामने हाथ जोड़कर खडे हो गये। वासुदेव श्रीकृष्ण तब अपनी धीर गंभीर आवाज में बोले-
हे उद्धव.... भगवान ... कहिये... क्या कहना चाहते हैं?
श्रीकृष्ण बोले- मेरे इस दुनिया से जाने के बाद तुम सबसे कहना कि कन्हैया ने कहा है कि प्रेम ही ईश्वर है। प्रेम सभी समस्याओं का समाधान है।
क्या कहते हैं वासुदेव? आपके मुख से अब यह प्रेम शब्द शोभा नहीं देता। क्योंकि आपने अभी हाल ही में पूरे द्वापर युग का वध कर दिया है।
वासुदेव अब उद्धव का मुंह ताकने लगे। फिर मुस्कुराकर बोल-
हे उद्धव... तुम ठीक कहते हो। मैंने पूरे द्वापरयुग का वध कर दिया है। परंतु आज मैं तुम्हें एक राज की बात कहना चाहता हूं। देखो... रणक्षेत्र में अर्जुन का सारथी वह कृष्ण तो आज भी वहीं है, लेकिन रथ पर अचानक खडेÞ होकर जिसने अर्जुन को युद्ध करने को आदेशित किया। उसे मैं नहीं जानता। वह कौन था? मैं नहीं जानता। ओर हे उद्धव... आज भी जब अभी मैं तुमसे यह कहता हूं कि प्रेम ही सत्य है, तो इस प्रेम करने वाले को भी मैं नहीं जानता। ये भी कोई ओर है? न तो मैंने युद्ध लड़ा। और न ही मैं प्रेम करने को कहता हूं। हे उद्धव... मैं तो मात्र वह बोलता हूं- जो कि ये अपरिचित अजन्मा मेरे मुख से बोलता है। गंधारी का श्राप और युगवध का तुम्हारा आरोप दोनों ही मुझ पर लगे हैं। पर हे उद्धव... मैं तो आज भी वहीं कन्हैया हूं। मैं तो आज भी गूंगा हूं। इसलिए बांसुरी बजाता हूं... कह कर श्रीकृष्ण मौन हो गये। कन्हैया की आंखों में मासूम बच्चे की आंखे चमक उठी। उद्धव को वापस भेजकर वे एक पेड़ के नीचे पांव पर पांव रखकर लेट गये। फिर उस वृक्ष और श्रीकृष्ण के बीच क्या संवाद हुआ? यह पृथ्वी का प्रत्येक पेड़ आज भी जानता है। मेरे कहने का आशय यह है कि ब्रह्मांड को जो मायने दिये गये हैं कि यह अति प्राचीन एक अण्डा है। इसमें विस्फोट हुआ और सृष्टि का निर्माण हुआ। यह वैज्ञानिक तरीके से, जैविक बायलोजिकल तरीके से गलत है अण्डे से एक तरह का ही जीवन उत्पन्न हो सकता है। उसमें से अरबों खरबों जीवों के साथ ही ये विशाल ब्रह्मांड उत्पन्न हो सकता। हालांकि तब से यह कथा प्रचलित है कि पहले अण्डा पैदा हुआ कि मुर्गी? यह दोनों ही मानसिक कल्पनाएं हैं। मैं अनुभव की सृष्टि से यह जानता हूं कि यह सकल अस्तित्व एक शांत निराकार चेतना में प्रजननशील है। उस निराकार चेतना में ही यह समूचा ब्रह्मांड अर्थात घूमते हुए ये गोल गोल अण्डेनुमा ग्रह स्थित है। वह निराकार चेतना कभी भी अपना रूप धारण नहीं करती। बल्कि प्रजनन द्वारा उसे अभिव्यक्ति और अभिमुख कर देती है। वह अपने मूल में समूल अभिव्यक्त होती है। मूल तब भी अप्रकट ही रहता है। हां.. मुखरित अवश्य होता है। जैसे कि चमेली का पुष्प ही चमेली बीज का मुर्खारत रूप है। शब्द ब्रह्म है। ब्रह्म निराकार सत्ता है। ब्रह्म ही आकाश और ब्रह्म ही ब्रह्माण्ड है। परंतु निराकार है। ब्रह्म ही अतिचेतना है। यह चेतना प्रजनन तो करती है, पर प्रकट यानि जन्म नहीं लेती। मैं आपसे पूछता हूं कि क्या कभी आपने शब्द प्रकट रूप देखा है? मैं जो यह शब्द लिख रहा हूं। यह तो शब्द की अभिव्यक्ति है। शब्द बीज अभी भी अजन्मा है्... और ब्रह्माण्ड से मुझे दिशा निर्देश दे रहा है। इसे आप यंू समझे। जैसे कि हम मनुष्य हैं। शब्द से पहले हमारे शारीरिक स्थूल शरीर में व्याप्त ब्रह्माण्ड शरीर में स्वर का स्ंपदन होता है। यह स्पंदन शरीर स्वर से होता है। फिर शरीर में ही शब्द की उत्पत्ति होती है दिल और दिमाग के सहवास से शब्द की उत्पत्ति होती है। लेकिन हम साकार शरीरधारी आज तक शब्द को मुख से मुखरित ही कर पाये हैं। उसे प्रकट नहीं कर पाये है। सृष्ट नहीं कर पाये है। हमसे ज्यादा समझदार और वैज्ञानिक तो धरती पर खिले ये पुष्प हैं। जो कि बीज के मुखरित होते ही पुष्प बन जाते है... और पूरी धरा पर बीज शब्द को अपनी खुशबू से बिखेर देते है। तो इस सकल अस्तित्व में जितने भी ये ग्रह नक्षत्र हंै। उन्हें विज्ञान ने अंतरिक्ष मेें जाकर इन गोल गोल घूमते हुए अण्डाकार ग्रहों को देखकर और दूर-दूर तक फैले प्राचीन ब्रह्माण्डीय कचरे तथा दूर-दूर लगी ब्रह्माण्डीय आग को ध्यान में रखकर इसके आदिकारण को बिगबैंग का नाम दिया है, लेकिन तथ्य यह है कि सृष्टि के आरंभ में मात्र एक सचेतन निराकार चेतना का अस्तित्व है यह सचेतनता सृजन के तत्व से पूर्ण है। मैं यहां उस आदि निराकार चेतना के लिए था शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं। हालांकि विज्ञान ने कर दिया है। विज्ञान कहता है कि था। यानि बिगबैंग का विस्फोट हुआ। इसलिए फिर उसे कहना पड़ा कि एक दिन यह सृष्टि नहीं रहेगी- सिकुड़ जायेगी। क्योंकि था की हमेशा मृत्यु होती है। था हमेशा साकार होता है परंतु है हमेशा निराकार है।
तो यह निराकार ना तो गोल था। न चपटा और ना ही धनीभूत था। यानि किसी आकृति में बद्धता ही सृष्टि निर्माण का आरंभ हो जाता है। इसलिए मैं यह बताना चाहता हूं कि निराकार चेतना का एक महाप्रसार ही सृष्टि के आरंभ में मौजूद है। आरंभ से यह आदिचेतना अकाल में केन्द्रिभूत है। पर अंधकार और प्रकाश से परे है। क्योंकि अंधकार और प्रकाश भी मानव आंख की तस्वीर मात्र है। अस्तित्व की निराकार चेतना में हमारे मानसिक विज्ञान और शारीरिक विज्ञान का कोई स्थान नहीं है। इसलिए जब हम मानव शरीर से होते हुए पृथ्वी शरीर, और पृथ्वी शरीर से होते हुए ब्रह्माण्ड शरीर और फिर ब्रह्माण्ड शरीर को भी छोड़ने के बाद जब निराकार चैतन्य हो जाते हैं, तभी हम उस आदि केद्रीय चेतना को समझ और अनुभव कर सकते हैं तो मैं इसी चेतना विज्ञान के आदिकाल से नव आदिकाल की बात करने के लिए इस पुस्तक का यह आमुख लिख रहा हूं- बिना निराकार यानि आकाश के सृष्टि का निर्माण संभव ही नहीं था। यह हमें अच्छी तरह से समझना चाहिए। बिगबैंग एक यांत्रिक चेतना विज्ञान का उद्भव मात्र है। क्या हमारी मां एक विस्फोट के द्वारा हम बच्चों को पौधों पर खिलने वाले ये मासूम और पवित्र गंध वाले पुष्प पौधों में हुए किन्हंी विस्फोटों के कारण पुष्पित हैं? ऐसा नहीं है। बीज हमेशा अंकुरित होता है। इसमें कभी भी विस्फोट नहीं होता। सर्वप्रथम तो हम यह जान लें कि मानव इतिहास का संपूर्ण ज्ञान विज्ञान और अध्यात्म मात्र मानव चेतना की उपज है। यह सारा क्रंदन पृथ्वी तक ही पुरस्कृत किया जा सकता है। पृथ्वी की सभी किताबें शास्त्र नहीं ब्रह्माण्ड के शून्य में एक कचरे की तरह बहायी जा सकती है। क्योंकि उन किताबों का ज्ञान मात्र पार्थिव बीज का कं्रदन है। ब्रह्माण्ड के विशाल महासागर की चुप्पी में जिस तरह से महाभयानक तरीके से उल्का पिण्डों ग्रहों, नक्षत्रों के बनने, नष्ट होने और महाभंयकर सूर्यों से अनुसृजन हो रहा है, वहां क्या पृथ्वी के एकमात्र सूर्य से उत्पन्न होने वाले हम मनुष्य अपने पुस्तकीय ज्ञान की किताबे उठाये क्या उसे प्रवचन देकर शांत कर सकते है? उस सृजन को रोक सकते है? क्या पृथ्वी पर खड़ा आदमजात उस अपरिचित अस्तित्व के सृजन को रोक सकता है? कदापि नहीं। अस्तित्व का सृजन अपने अस्तित्व की आदिचेतना मेंपूर्ण है। अगर पूर्ण नहीं होता तो यह सृजन आरंभ ही नहीं हो सकता था। उसका परिचय हम पृथ्वी पर मनुष्य शरीर द्वारा प्राप्त करते है। परंतु आदिचेतना का सृजन यहीं आकर समाप्त नहीं हो गया है। यह तो लाखों वर्षों पूर्व ही ब्रह्माण्ड की काली गुफाओं में घुसकर नई कविता लिखने को बैठ गया है... अब पुन: यही ब्रह्म हम सभी के माध्यम से पृथ्वी से वार्तालाप करना चाहता है। पृथ्वी को अपनी बेटी की तरह गोदी में उठाकर चूमना चाहता है। यह सकल अस्तित्व मात्र प्रजनन से उत्पन्न हो रहा है। विस्फोट से तो यह नष्ट हो रहा है। पहले थी एक निराकार आदिसचेतन चेतना। इस आदिचेतना ने अपने केन्द्रीय गर्भ में स्वर को गुनगुनाया। यह स्वर ही उस चेतना में से ध्वनि बनकर बाहर निकला और उस विशाल प्राचीन शून्य में उन ध्वनियों ने हड़कंप मचा दिया। परिणामस्वरूप गति के गतिमान होने के कारण ग्रह ओर नक्षत्रों की उत्पत्ति हुई। मैं विज्ञान के सामने एक प्रश् न छोड़ता हूं। कि क्यों वो विस्फोट से ही सृष्टि के आरंभ को जोड़ते हैं? सृष्टि निर्माण को संगीत की मधुर धुन से क्यों नहीं जोड़ते? जहां तक मैं जानता हूं कि विस्फोट की कैमस्ट्री यह है कि यह कुछ कैमिकल के रीजन से होता है। लेकिन विस्फोट की कैमस्ट्री यह भी है कि यह साकार आकृति में ही होगा। क्योंकि साकार आकृति के पास ही ऐसे तत्व होते हैं जो कि एक दूसरे के खिलाफ प्रतिक्रिया करते हैं वैसे आकृति बनने से पूर्व भी आकृति के लिए कच्चा माल तरल पदार्थ के रूप में मौजूद होना चाहिए। यहा पदार्थ तरल भी हो सकता है। ठोस भी हो सकता है। गैसीय भी हो सकता है। तभी वह कलांतर में धानीभूत होकर आपस में मिलेगा और रिकेशन के परिणाम स्वरूप विस्फोट होगा। विज्ञान सृष्टि के आरंभ को मात्र विस्फोट के कारण मान रहा है। इसका मतलब आरंभ में उन पदार्थों का तीनों रूप ठोस, तरल और गैसीय के धनीभूत होने के कारण विस्फोट हुआ। तब तो हमने सृष्टि निर्माण के बाद की किसी प्राचीन अवस्था की खोज की है। बिगबैंग तो सृष्टि उत्पत्ति के बाद के किसी प्राचीन अवस्था की खोज की है। सृष्टि उत्पत्ति के बाद के किसी प्राचीन आदिघटना का स्थूल वैज्ञानिक नाटय रूपान्तरण है। मैं आपसे कहना यह चाह रहा हूं कि दुनिया और अस्तित्व का आरंभ कभी भी विस्फोट से नहीं होता। आरंभ हमेशा संगीत ओर प्रजनन से होता है। प्रजनन का आदिरूप ही शब्द है। आधुनिक रूप से संगीत है। अतीत के पेट से ही वर्तमान का जन्म होता है। लेकिन यह जन्म पेट में विस्फोट से नहीं होता। पेट के विस्फोट से भी नहीं होता है। अगर हमारी माता के पेट में विस्फोट हो जाता तो क्या हम जन्म ले सकते थे? पर विनाश हमेशाा विस्फोट से होता है। अंतरिक्ष में दूर दूर तक बिखरे पडेÞ ये प्राचीन ग्रह उस आदि सनातन मां के द्वारा प्रसवित अण्डे हैं। जिन्हें अभी वह सचेतन निराकारचेतना एक पक्षी की तरह अपनी गर्मी से यानि अपने होने का अहसास कराके सै रही है। समय आने पर ये सभी निर्जन ग्रह भी पृथ्वी पक्षी के अण्डों की तरह फुटेंगे। ध्यान रखें कि मैं कह रहा हूं- फूटेंगे। फटेंगे नहीं। विस्फोट नहीं होगा। तब उनमे से भी संतति का आरंभ होगा... तो अंतरिक्ष में हो रहे लगातार महाप्रलयंकारी विस्फोटों का सृष्टि के आरंभ से कोई लेना देना नहीं है। हां... इन विस्फोटों का इतना ही अर्थ है कि इनके द्वारा वे ग्रह ताजे रहते हैं। मृत नहीं होते। जैसे कि हमारे ग्रह पर चलता ओर बहता पानी शुद्ध रहता है। पीने योग्य रहता है। उसमें कीड़े नहीं पड़ते। और सूर्यदेव भी उस पानी का अपहरण करके आकाश में नहीं ले जा सकते। वासुदेव श्रीकृष्ण जिसे कर्म कहते है। वह संपूर्ण अस्तित्व में चल रहा है। काल ने काली ओर कृष्ण के माध्यम से बताया है कि इस अलौकिक अस्तित्व को अंतरिम में हो रहे ये महाभयानक विस्फोट मिटा नहीं सकते। क्योंकि सृष्टि का आरंभ ही अंत का कारण होता है। हमारे योगियों की जो ओम की ध्वनि ब्रह्माण्ड में सुनाई देती है। वह इस बात का सबूत है कि ध्वनि ही कहीं से टकरा कर पुन: लौट रही है। इसी कारण हमें सुनाई दे रही है। पृथ्वी पर भी इको साउंडिंग तभी होती है- जब वह अपनी ही आवाज से टकरा जाये। परिणाम स्वरूप साउण्ड इको में बदल जाती है। यह ब्रह्माण्ड वहीं तक विस्तारित है जहां तक वह आदिचेतना सचेत है। उस आदिचेतना का लगातार प्रसव चल रहा है। इस प्रसव की संचेतना के अंतिम बिंदु से टकराकर ही ध्वनि में एक गूंज पैदा होती है। और फिर वहीं ध्वनि या अक्षर ही ब्रह्म बनकर सृष्टि का निर्माण करने लगती है। इसलिए मैने कहा कि निराकार की संचेतना ही आरंभ और अंतिम सीमा है। ब्रह्माण्ड अनंत नहीं बल्कि वहीं तक है- जहां तक वह आदि चेतना स्वयं को लेकर सचेतन होकर टहल रही है। टहल आयी है। यानि उसका आगे बढना ही उसका प्रजनन है। और जहां संचेतना का प्रजनन ठिठक कर रूका हुआ है- वह भी तदर्थ अंतिम बिंदु ही है। यह तदर्थता ही ब्रह्माण्ड में निराकार को सृजन करने का स्पेस देती है। इसलिए मेरे अनुभव में ब्रह्माण्ड के लिए अनंत ाश्ब्द का इस्तेमाल अवैज्ञानिक है। अनंत में प्रजनन हो ही नहीं सकता। बल्कि वहां तो मात्र विनाश ही हो सकता है। अनंतता कभी भी अनुशासन में नहीं होती। हमारे इस पृथ्वी पर रहने वाला मकान अनंत में निर्मित नहीं किया जा सकता बल्कि एक अनुशासन के अदंर निर्मित किया है। किया जा सका है। अनुशासन के मायने मकान की नींव का होना जरूरी है। तो अनंत कभी भी अनुशासन में नहीं होता, बल्कि एक आवारा ओर निर्जीव चेतना की हलचल का नाम है। ब्रह्माण्ड अनंत नहीं अनहद है। खैर, मुझे बहुत कुछ कहना है। लेकिन शायद अभी कहना ठीक नहीं हो। लेकिन यह सच्ची बात है कि जो कुछ भी मै लिख रहा हूं। कह रहा हूं। वह सब कुछ ब्रह्माण्ड में पहले से उपस्थित है। मैं तो उसे मात्र आप तक पहुंचा रहा हूं....।

Monday, November 2, 2009

संसार और सन्यास

संसार जब किसी मनुष्य के हृदय मे ‘‘न्यास याने ट्रस्ट’’ हो जाता है तो उसे ही ‘सन्यासी’ कह देते हैं। किसी मनुष्य के लिए संसार का न्यास में ट्रस्ट में बदल जाना ही सन्यास है। अत: मनुष्य संसार को धर्म से नहीं बल्कि इसका ‘न्यासी’ हो जात है। ट्रस्टी हो जाता है। इसी कारण गांधी जैसा साधारण व्यक्ति सच्चे अर्थाें में राष्टÑपिता बनकर भी सन्यासी था। महात्मा है।
लेकिन इस वैज्ञानिक युग में मनुष्य मात्र किताबी चेतना से सच को समझने का प्रयास कर रहा है। यही उसके पतन का कारण है। शास्त्र और ग्रंथ तो मार्ग हैं। इन पर चलकर मनुष्य सत्य के द्वार पर पहुंच जाता है। लेकिन द्वार तो स्वयं को ही खोलना पड़ता है। अत: क्लेश ‘संसार’ और ‘संसार’ और ‘संन्साय’ के बीच नहीं हैं। झगड़ा तो मनुष्य की समझ के जिद्दी हो जाने से है।
अगर हम करुणा के उत्तरदायी सिंहासन पर बैठाकर दुनिया को देखेंगे तो समूचा जगत हमें हमारे घर से निकलता और घर में ही प्रविष्ट होकर विकसित होता दिखाई देगा। लेकिन अगर हम दूसरे के घर से सत्य का द्वार आरंभ करते है तो वह मनुष्य द्वारा लिखा जाने वाला साहित्य हो जाता है। संसार से ज्यादा महान सन्यास है। मनुष्य का इस संसार का न्यासी हो जाना ही सन्यासी हो जाना है। यही अध्यात्म का परम विकास है। यही अतिमानवता हैं।
रविदत्त मोहता

Saturday, October 10, 2009

नूतन विधान का वर्चस्व

कभी-कभी मुझे लगता है कि इस पृथ्वी के संविधान को अब एक नूतन विधान की आवश्यकता है। कारण यह है कि धर्म ने तो सूर्य को पृथ्वी के सदियों तक चक्कर लगवा दिये थे... ये तो भला है इस विज्ञान का कि जिसने सूर्य को धर्म के श्राप से मुक्त किया। इस महान विज्ञान ने ही तब अपने भाई धर्म से कहा था-‘‘भैया...पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगा रही है... सूर्य तो सौर मंडल का एक स्थिर तिलक है।’’
कहने का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी पर रहने वाले हम सभी मनुष्यों को भी पृथ्वी माता जैसा ही गतिशील होना चाहिए। विज्ञान ठीक कहता है। गीता भी ठीक कहती है कि कर्म ही पृथ्वी का प्रतिनि धित्व कर सकते हैं। संतान को अपने मां बाप पर तो जाना ही चाहिए न ? यह पृथ्वी हमारी मां है... और सूर्य हमारा प्राचीन पिता है।
तो गीता को समझने के लिए बस इतना भर करना है कि हम अपनी विराट मां धरती के कर्म को समझ लें। क्या कभी आपने सोचा है कि यह मां अरबों-खरबों वर्षांे से उस बियावन-सुनसान ब्रह्माण्ड में हमारे लिए अपनी धुरी और सूर्य का चक्कर क्यों लगा रही है? इसलिए नहीं कि उसे घूमने-फिरने का बड़ा शोक है? बल्कि इसलिए कि जिससे धरती पर जीवन हंसता-खेलता रहे... हम जन्म लेते रहे...
कभी-कभी मुझे ऐसा भी लगता है कि मनुष्य को अगर कर्म को सही रूप में समझना है तो उसे ब्रह्माण्ड में झांक कर पृथ्वी को सूर्य के चारों और घूमते हुए एक बार अवश्य देखलेना चाहिए... इसीलिए विज्ञान को मैं श्रीकृष्ण की ‘सुदर्शन शक्ति’ कहता हूं... मुझे हमेशा श्रीकृष्ण की की ‘सुदर्शन चक्र-’ विज्ञान और पृथ्वी का प्रतिरूप का लगता रहा है... इधर यही ‘ सुदर्शन चक्र’ सािहत्य में शब्द रूप में लेखकों, कवियों, विचारकों ओर पत्रकारों की अंगुलियों के मध्य कलम बनकर ‘शब्द’ द्वारा सृजन के नवीन विस्फोट कर रहा है...
हमारे यहां लोकतंत्र के चार स्तंभ बतलाये गए हैं। चौथा स्तंभ पत्रकारिता यानि शब्द विज्ञान को बतलाया गया है। अध्यात्म में जिस तरह ‘तीसरी आंख’ का महत्व है- लोकतंत्र में उसी तरह ‘चौथी आंख’ यानि पत्रकारिता का महत्व है। मैं आने वाले भविष्य पर कुछ संकेत देना चाहता हूं... बात यह है कि सन् 2012 से चौथी दुनिया के लोग इस प्राचीन ग्रह के राजकुमार घोषित किये जाने लगेंगे... ऐसा अज्ञात अस्तित्व में तय हुआ है। — रविदत्त मोहता