Saturday, January 30, 2010

एकांत मेरा धर्मशास्त्र हैं

रविदत्त मोहता
जोधपुर। मैंने गुप्त आकाश में मुख से सुना है कि धरती पर उपस्थित सभी प्राणी अपने अपने सिर ऊपर उठाये हुए है क्योंकि आकाश ने अपना सिर इन सबके लिए पृथ्वी पर नीचे झुकाया है। अगर कभी आप आकाश को अपनी इन दोनों आंखों से पूर्णत्व में देख पायें तो आप देखेंगे कि पृथ्वी पर झुका हुआ यह आकाश एक कबूतरी की तरह पृथ्वी अण्डे को अपनी गर्मी से लगातार सै रहा है. .. इसी कारण इस पृथ्वी अण्डे से यह चराचर जगत पैदा हो रहा है। और आकाश ही अपनी गर्मी से इसे पाल पोसकर बड़ा कर रहा है। हम मात्र सूर्य की गर्मी से ही जीवित नहीं हैं। बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की गर्मी से अभी तक अस्तित्व में सुरक्षित है। मैं कभी भी उस चेतना को समझ नहीं पाया जिसने किसी एक टुकडेÞ को ही सत्य माना। सत्य न तो विभक्त है। न ही भक्त है। सत्य तो अखिल अस्तित्व में व्यक्त है। यह व्यक्त ही व्यक्ति होकर कभी राम तो कभी कृष्ण होता है। और ये राम और कृष्ण ही वक्तत्व होकर रामायण और गीता हो जाते हैं। जिस रामायण और गीता को हम श्रीराम और श्रीकृष्ण की कह रहे हैं वे तो उस अव्यक्त के व्यक्त होने का वक्तत्व है। ब्रह्मांड में वक्त का अस्तित्व नहीं होता। वहां मात्र व्यक्त का अस्तित्व होता है। ब्रह्मांड का एक सूर्य ही पृथ्वी समुद्रों से पानी उठाकर आकाश को पहुंचा देता है। आकाश क्या है? पृथ्वी का ही हिस्सा। लेकिन ध्यान रखें कि आकाश और ब्रह्मांड मेें बहुत फर्क है। ब्रह्मांड का पृथ्वी के आकाश से कोई लेना देना नहीं है। ब्रह्मांड में पृथ्वी तो मात्र चिड़िया का एक छोटा सा अण्डा है। इसे ब्रह्मांड अपने पेट में धारण किये हुए है। पृथ्वी पर वर्षा पृथ्वी के आकाश से होती है। ब्रह्मांड से कभी भी पानी की वर्षा नहीं हो सकती, क्योंकि वहां पांच तत्व हैं ही नही। इस धरती पर जितना भी खेल चल रहा है। लीला चल रही है- वह धरती की सीमा में ही चल रही है। इसलिए इस सीमा में रहने वाली चेतना इसी सीमा में मरणधर्मा है। यह पार्थिव चेतना पृथ्वी की गति के साथ साथ ही ब्रह्मांड में पृथ्वी की तरह गोल गोल अण्डाकार अपनी धुरी और परिधि में घूमने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती। इसी कारण मानव विकास का गौरव पथ अवरूद्ध हो गया है। मानव शब्द का नव आज भी अपनी मां के होते हुए मानव नहीं हो पाया है। सच्चा और पवित्र विकास नहीं कर पाया है। एक प्राचीन अलौकिक घटना में द्वापर युग के मुख द्वारा आपको समझाना चाहता हूं। माता यशोदा को कन्हैया ने जब अपना मुख खोलकर दिखाया तो माता यशोदा उसमें अखिल ब्रह्मांड के ग्रह नक्षत्रों, अरबों खरबों तारों के बनने और बिखरने को देखकर मारे डर के बेहोश हो गई। यही घटना मैंने भी बचपन में अपनी पड़दादी मां से कहानियों में सुनी है। परंतु हमने इस घटना के तत्व को छोड़ दिया और कन्हैया के मुख को पकड़कर बैठ गये। श्रद्धा होती ही ऐसी है।
यह तत्व नहीं पकड़ती बस स्थूल को ही पकड़कर बैठ जाती है। इस घटना के माध्यम से ब्रह्मांड पहले ही हमें यह संदेश कन्हैया के बालमुख से दे गया था कि एक दिन वह इस कन्हैया के मुख से द्वापर युग के आमुख के उद्बोधन देगा। गीता ब्रह्मांड उद्बोधन का ही संबोधन है। दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं। जिसमें आप सत्य के आर पार देख पायेंगे। गीता में एक श्लोक आता है। वृष्णीनां वासुदेवोउस्मि पाण्डवानां धनंजय:।
मुनीनामप्यहं व्यास: कवीनामुशना कवि:।।
यह श्लोक अद्भुत है। यहां निराकार ने अपना चेहरा दिखा दिया। लेकिन कमाल यह है कि यह भी कह गया- मैं ये नहीं हूं। यानि जब वह निराकार चेतना यह कहती है कि- वृष्णियों में मैं याने वासुदेव श्रीकृष्ण हूं, पाण्डवों में धनंज्य अर्जुन हूं, मुनियों में व्यास और कवियों में उशना कवि हूं। तो इसका मतलब यह हुआ और साफ साफ दिखाई देता है कि श्रीकृष्ण के मुख से जो बोल रहे हैं, वे यह घोषणा कर रहे हैं कि वे न तो श्री विष्णु हैं, और न ही श्रीकृष्ण है। अर्थात यह अजन्मा अपने होने का सबूत तो देता है- परंतु स्वयं पर ज्यादा बात करना पसंद नहीं करता। अता पता बताता है- परंतु अपना पिनकोड नम्बर नहीं बताता है। ब्रह्रमांड एक पिनकोड रहित सत्ता है। न तो कोई इसे डी-कोड कर सकता है। और न ही इसका कोई एसटीडी कोड नम्बर है। यह तो मात्र अपनी मर्जी से आवश्यकतानुसार युग मुखों और मानवमुखों से शब्द के माध्यम से मुर्खारत होता है। शब्द ब्रह्म है- यह स्वर्णमयी पंक्ति 100 प्रतिशत सच्ची और प्रमाणिक है। यहां मैं अपनी बात और स्पष्ट करने के लिए आपके सामने एक उदाहरण रखना चाहता हूं। कृपया आप इसे समझे। महाभारत के उस महाभयानक युद्ध के बाद श्रीकृष्ण बहुत चुप चुप रहने लगे थे। उनका ज्यादातर समय जंगलों की सुनसान पगडण्डियों पर अकेले घुमते हुए बीतता था। अपने जीवन की इस अंतिम वेला में उनके पास उद्धव का निकटतम प्रवास रहा। एक दिन श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को एक विशेष संदेश देने के लिए बुलाया। उद्धव भी उन दिनों बहुत डरे डरे रहते थे। कारण यह था कि श्रीकृष्ण का इस तरह चुप चुप रहना उन्हें चिंतातुर करता था। तो श्रीकृष्ण और उद्धव जंगल में पुन: मिले। एक पेड़ की छांव में दोनों खड़े थे। श्रीकृष्ण पेड़ के तने से अपना तन लगाकर खडेÞ हो गये और उद्धव उनके सामने हाथ जोड़कर खडे हो गये। वासुदेव श्रीकृष्ण तब अपनी धीर गंभीर आवाज में बोले-
हे उद्धव.... भगवान ... कहिये... क्या कहना चाहते हैं?
श्रीकृष्ण बोले- मेरे इस दुनिया से जाने के बाद तुम सबसे कहना कि कन्हैया ने कहा है कि प्रेम ही ईश्वर है। प्रेम सभी समस्याओं का समाधान है।
क्या कहते हैं वासुदेव? आपके मुख से अब यह प्रेम शब्द शोभा नहीं देता। क्योंकि आपने अभी हाल ही में पूरे द्वापर युग का वध कर दिया है।
वासुदेव अब उद्धव का मुंह ताकने लगे। फिर मुस्कुराकर बोल-
हे उद्धव... तुम ठीक कहते हो। मैंने पूरे द्वापरयुग का वध कर दिया है। परंतु आज मैं तुम्हें एक राज की बात कहना चाहता हूं। देखो... रणक्षेत्र में अर्जुन का सारथी वह कृष्ण तो आज भी वहीं है, लेकिन रथ पर अचानक खडेÞ होकर जिसने अर्जुन को युद्ध करने को आदेशित किया। उसे मैं नहीं जानता। वह कौन था? मैं नहीं जानता। ओर हे उद्धव... आज भी जब अभी मैं तुमसे यह कहता हूं कि प्रेम ही सत्य है, तो इस प्रेम करने वाले को भी मैं नहीं जानता। ये भी कोई ओर है? न तो मैंने युद्ध लड़ा। और न ही मैं प्रेम करने को कहता हूं। हे उद्धव... मैं तो मात्र वह बोलता हूं- जो कि ये अपरिचित अजन्मा मेरे मुख से बोलता है। गंधारी का श्राप और युगवध का तुम्हारा आरोप दोनों ही मुझ पर लगे हैं। पर हे उद्धव... मैं तो आज भी वहीं कन्हैया हूं। मैं तो आज भी गूंगा हूं। इसलिए बांसुरी बजाता हूं... कह कर श्रीकृष्ण मौन हो गये। कन्हैया की आंखों में मासूम बच्चे की आंखे चमक उठी। उद्धव को वापस भेजकर वे एक पेड़ के नीचे पांव पर पांव रखकर लेट गये। फिर उस वृक्ष और श्रीकृष्ण के बीच क्या संवाद हुआ? यह पृथ्वी का प्रत्येक पेड़ आज भी जानता है। मेरे कहने का आशय यह है कि ब्रह्मांड को जो मायने दिये गये हैं कि यह अति प्राचीन एक अण्डा है। इसमें विस्फोट हुआ और सृष्टि का निर्माण हुआ। यह वैज्ञानिक तरीके से, जैविक बायलोजिकल तरीके से गलत है अण्डे से एक तरह का ही जीवन उत्पन्न हो सकता है। उसमें से अरबों खरबों जीवों के साथ ही ये विशाल ब्रह्मांड उत्पन्न हो सकता। हालांकि तब से यह कथा प्रचलित है कि पहले अण्डा पैदा हुआ कि मुर्गी? यह दोनों ही मानसिक कल्पनाएं हैं। मैं अनुभव की सृष्टि से यह जानता हूं कि यह सकल अस्तित्व एक शांत निराकार चेतना में प्रजननशील है। उस निराकार चेतना में ही यह समूचा ब्रह्मांड अर्थात घूमते हुए ये गोल गोल अण्डेनुमा ग्रह स्थित है। वह निराकार चेतना कभी भी अपना रूप धारण नहीं करती। बल्कि प्रजनन द्वारा उसे अभिव्यक्ति और अभिमुख कर देती है। वह अपने मूल में समूल अभिव्यक्त होती है। मूल तब भी अप्रकट ही रहता है। हां.. मुखरित अवश्य होता है। जैसे कि चमेली का पुष्प ही चमेली बीज का मुर्खारत रूप है। शब्द ब्रह्म है। ब्रह्म निराकार सत्ता है। ब्रह्म ही आकाश और ब्रह्म ही ब्रह्माण्ड है। परंतु निराकार है। ब्रह्म ही अतिचेतना है। यह चेतना प्रजनन तो करती है, पर प्रकट यानि जन्म नहीं लेती। मैं आपसे पूछता हूं कि क्या कभी आपने शब्द प्रकट रूप देखा है? मैं जो यह शब्द लिख रहा हूं। यह तो शब्द की अभिव्यक्ति है। शब्द बीज अभी भी अजन्मा है्... और ब्रह्माण्ड से मुझे दिशा निर्देश दे रहा है। इसे आप यंू समझे। जैसे कि हम मनुष्य हैं। शब्द से पहले हमारे शारीरिक स्थूल शरीर में व्याप्त ब्रह्माण्ड शरीर में स्वर का स्ंपदन होता है। यह स्पंदन शरीर स्वर से होता है। फिर शरीर में ही शब्द की उत्पत्ति होती है दिल और दिमाग के सहवास से शब्द की उत्पत्ति होती है। लेकिन हम साकार शरीरधारी आज तक शब्द को मुख से मुखरित ही कर पाये हैं। उसे प्रकट नहीं कर पाये है। सृष्ट नहीं कर पाये है। हमसे ज्यादा समझदार और वैज्ञानिक तो धरती पर खिले ये पुष्प हैं। जो कि बीज के मुखरित होते ही पुष्प बन जाते है... और पूरी धरा पर बीज शब्द को अपनी खुशबू से बिखेर देते है। तो इस सकल अस्तित्व में जितने भी ये ग्रह नक्षत्र हंै। उन्हें विज्ञान ने अंतरिक्ष मेें जाकर इन गोल गोल घूमते हुए अण्डाकार ग्रहों को देखकर और दूर-दूर तक फैले प्राचीन ब्रह्माण्डीय कचरे तथा दूर-दूर लगी ब्रह्माण्डीय आग को ध्यान में रखकर इसके आदिकारण को बिगबैंग का नाम दिया है, लेकिन तथ्य यह है कि सृष्टि के आरंभ में मात्र एक सचेतन निराकार चेतना का अस्तित्व है यह सचेतनता सृजन के तत्व से पूर्ण है। मैं यहां उस आदि निराकार चेतना के लिए था शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं। हालांकि विज्ञान ने कर दिया है। विज्ञान कहता है कि था। यानि बिगबैंग का विस्फोट हुआ। इसलिए फिर उसे कहना पड़ा कि एक दिन यह सृष्टि नहीं रहेगी- सिकुड़ जायेगी। क्योंकि था की हमेशा मृत्यु होती है। था हमेशा साकार होता है परंतु है हमेशा निराकार है।
तो यह निराकार ना तो गोल था। न चपटा और ना ही धनीभूत था। यानि किसी आकृति में बद्धता ही सृष्टि निर्माण का आरंभ हो जाता है। इसलिए मैं यह बताना चाहता हूं कि निराकार चेतना का एक महाप्रसार ही सृष्टि के आरंभ में मौजूद है। आरंभ से यह आदिचेतना अकाल में केन्द्रिभूत है। पर अंधकार और प्रकाश से परे है। क्योंकि अंधकार और प्रकाश भी मानव आंख की तस्वीर मात्र है। अस्तित्व की निराकार चेतना में हमारे मानसिक विज्ञान और शारीरिक विज्ञान का कोई स्थान नहीं है। इसलिए जब हम मानव शरीर से होते हुए पृथ्वी शरीर, और पृथ्वी शरीर से होते हुए ब्रह्माण्ड शरीर और फिर ब्रह्माण्ड शरीर को भी छोड़ने के बाद जब निराकार चैतन्य हो जाते हैं, तभी हम उस आदि केद्रीय चेतना को समझ और अनुभव कर सकते हैं तो मैं इसी चेतना विज्ञान के आदिकाल से नव आदिकाल की बात करने के लिए इस पुस्तक का यह आमुख लिख रहा हूं- बिना निराकार यानि आकाश के सृष्टि का निर्माण संभव ही नहीं था। यह हमें अच्छी तरह से समझना चाहिए। बिगबैंग एक यांत्रिक चेतना विज्ञान का उद्भव मात्र है। क्या हमारी मां एक विस्फोट के द्वारा हम बच्चों को पौधों पर खिलने वाले ये मासूम और पवित्र गंध वाले पुष्प पौधों में हुए किन्हंी विस्फोटों के कारण पुष्पित हैं? ऐसा नहीं है। बीज हमेशा अंकुरित होता है। इसमें कभी भी विस्फोट नहीं होता। सर्वप्रथम तो हम यह जान लें कि मानव इतिहास का संपूर्ण ज्ञान विज्ञान और अध्यात्म मात्र मानव चेतना की उपज है। यह सारा क्रंदन पृथ्वी तक ही पुरस्कृत किया जा सकता है। पृथ्वी की सभी किताबें शास्त्र नहीं ब्रह्माण्ड के शून्य में एक कचरे की तरह बहायी जा सकती है। क्योंकि उन किताबों का ज्ञान मात्र पार्थिव बीज का कं्रदन है। ब्रह्माण्ड के विशाल महासागर की चुप्पी में जिस तरह से महाभयानक तरीके से उल्का पिण्डों ग्रहों, नक्षत्रों के बनने, नष्ट होने और महाभंयकर सूर्यों से अनुसृजन हो रहा है, वहां क्या पृथ्वी के एकमात्र सूर्य से उत्पन्न होने वाले हम मनुष्य अपने पुस्तकीय ज्ञान की किताबे उठाये क्या उसे प्रवचन देकर शांत कर सकते है? उस सृजन को रोक सकते है? क्या पृथ्वी पर खड़ा आदमजात उस अपरिचित अस्तित्व के सृजन को रोक सकता है? कदापि नहीं। अस्तित्व का सृजन अपने अस्तित्व की आदिचेतना मेंपूर्ण है। अगर पूर्ण नहीं होता तो यह सृजन आरंभ ही नहीं हो सकता था। उसका परिचय हम पृथ्वी पर मनुष्य शरीर द्वारा प्राप्त करते है। परंतु आदिचेतना का सृजन यहीं आकर समाप्त नहीं हो गया है। यह तो लाखों वर्षों पूर्व ही ब्रह्माण्ड की काली गुफाओं में घुसकर नई कविता लिखने को बैठ गया है... अब पुन: यही ब्रह्म हम सभी के माध्यम से पृथ्वी से वार्तालाप करना चाहता है। पृथ्वी को अपनी बेटी की तरह गोदी में उठाकर चूमना चाहता है। यह सकल अस्तित्व मात्र प्रजनन से उत्पन्न हो रहा है। विस्फोट से तो यह नष्ट हो रहा है। पहले थी एक निराकार आदिसचेतन चेतना। इस आदिचेतना ने अपने केन्द्रीय गर्भ में स्वर को गुनगुनाया। यह स्वर ही उस चेतना में से ध्वनि बनकर बाहर निकला और उस विशाल प्राचीन शून्य में उन ध्वनियों ने हड़कंप मचा दिया। परिणामस्वरूप गति के गतिमान होने के कारण ग्रह ओर नक्षत्रों की उत्पत्ति हुई। मैं विज्ञान के सामने एक प्रश् न छोड़ता हूं। कि क्यों वो विस्फोट से ही सृष्टि के आरंभ को जोड़ते हैं? सृष्टि निर्माण को संगीत की मधुर धुन से क्यों नहीं जोड़ते? जहां तक मैं जानता हूं कि विस्फोट की कैमस्ट्री यह है कि यह कुछ कैमिकल के रीजन से होता है। लेकिन विस्फोट की कैमस्ट्री यह भी है कि यह साकार आकृति में ही होगा। क्योंकि साकार आकृति के पास ही ऐसे तत्व होते हैं जो कि एक दूसरे के खिलाफ प्रतिक्रिया करते हैं वैसे आकृति बनने से पूर्व भी आकृति के लिए कच्चा माल तरल पदार्थ के रूप में मौजूद होना चाहिए। यहा पदार्थ तरल भी हो सकता है। ठोस भी हो सकता है। गैसीय भी हो सकता है। तभी वह कलांतर में धानीभूत होकर आपस में मिलेगा और रिकेशन के परिणाम स्वरूप विस्फोट होगा। विज्ञान सृष्टि के आरंभ को मात्र विस्फोट के कारण मान रहा है। इसका मतलब आरंभ में उन पदार्थों का तीनों रूप ठोस, तरल और गैसीय के धनीभूत होने के कारण विस्फोट हुआ। तब तो हमने सृष्टि निर्माण के बाद की किसी प्राचीन अवस्था की खोज की है। बिगबैंग तो सृष्टि उत्पत्ति के बाद के किसी प्राचीन अवस्था की खोज की है। सृष्टि उत्पत्ति के बाद के किसी प्राचीन आदिघटना का स्थूल वैज्ञानिक नाटय रूपान्तरण है। मैं आपसे कहना यह चाह रहा हूं कि दुनिया और अस्तित्व का आरंभ कभी भी विस्फोट से नहीं होता। आरंभ हमेशा संगीत ओर प्रजनन से होता है। प्रजनन का आदिरूप ही शब्द है। आधुनिक रूप से संगीत है। अतीत के पेट से ही वर्तमान का जन्म होता है। लेकिन यह जन्म पेट में विस्फोट से नहीं होता। पेट के विस्फोट से भी नहीं होता है। अगर हमारी माता के पेट में विस्फोट हो जाता तो क्या हम जन्म ले सकते थे? पर विनाश हमेशाा विस्फोट से होता है। अंतरिक्ष में दूर दूर तक बिखरे पडेÞ ये प्राचीन ग्रह उस आदि सनातन मां के द्वारा प्रसवित अण्डे हैं। जिन्हें अभी वह सचेतन निराकारचेतना एक पक्षी की तरह अपनी गर्मी से यानि अपने होने का अहसास कराके सै रही है। समय आने पर ये सभी निर्जन ग्रह भी पृथ्वी पक्षी के अण्डों की तरह फुटेंगे। ध्यान रखें कि मैं कह रहा हूं- फूटेंगे। फटेंगे नहीं। विस्फोट नहीं होगा। तब उनमे से भी संतति का आरंभ होगा... तो अंतरिक्ष में हो रहे लगातार महाप्रलयंकारी विस्फोटों का सृष्टि के आरंभ से कोई लेना देना नहीं है। हां... इन विस्फोटों का इतना ही अर्थ है कि इनके द्वारा वे ग्रह ताजे रहते हैं। मृत नहीं होते। जैसे कि हमारे ग्रह पर चलता ओर बहता पानी शुद्ध रहता है। पीने योग्य रहता है। उसमें कीड़े नहीं पड़ते। और सूर्यदेव भी उस पानी का अपहरण करके आकाश में नहीं ले जा सकते। वासुदेव श्रीकृष्ण जिसे कर्म कहते है। वह संपूर्ण अस्तित्व में चल रहा है। काल ने काली ओर कृष्ण के माध्यम से बताया है कि इस अलौकिक अस्तित्व को अंतरिम में हो रहे ये महाभयानक विस्फोट मिटा नहीं सकते। क्योंकि सृष्टि का आरंभ ही अंत का कारण होता है। हमारे योगियों की जो ओम की ध्वनि ब्रह्माण्ड में सुनाई देती है। वह इस बात का सबूत है कि ध्वनि ही कहीं से टकरा कर पुन: लौट रही है। इसी कारण हमें सुनाई दे रही है। पृथ्वी पर भी इको साउंडिंग तभी होती है- जब वह अपनी ही आवाज से टकरा जाये। परिणाम स्वरूप साउण्ड इको में बदल जाती है। यह ब्रह्माण्ड वहीं तक विस्तारित है जहां तक वह आदिचेतना सचेत है। उस आदिचेतना का लगातार प्रसव चल रहा है। इस प्रसव की संचेतना के अंतिम बिंदु से टकराकर ही ध्वनि में एक गूंज पैदा होती है। और फिर वहीं ध्वनि या अक्षर ही ब्रह्म बनकर सृष्टि का निर्माण करने लगती है। इसलिए मैने कहा कि निराकार की संचेतना ही आरंभ और अंतिम सीमा है। ब्रह्माण्ड अनंत नहीं बल्कि वहीं तक है- जहां तक वह आदि चेतना स्वयं को लेकर सचेतन होकर टहल रही है। टहल आयी है। यानि उसका आगे बढना ही उसका प्रजनन है। और जहां संचेतना का प्रजनन ठिठक कर रूका हुआ है- वह भी तदर्थ अंतिम बिंदु ही है। यह तदर्थता ही ब्रह्माण्ड में निराकार को सृजन करने का स्पेस देती है। इसलिए मेरे अनुभव में ब्रह्माण्ड के लिए अनंत ाश्ब्द का इस्तेमाल अवैज्ञानिक है। अनंत में प्रजनन हो ही नहीं सकता। बल्कि वहां तो मात्र विनाश ही हो सकता है। अनंतता कभी भी अनुशासन में नहीं होती। हमारे इस पृथ्वी पर रहने वाला मकान अनंत में निर्मित नहीं किया जा सकता बल्कि एक अनुशासन के अदंर निर्मित किया है। किया जा सका है। अनुशासन के मायने मकान की नींव का होना जरूरी है। तो अनंत कभी भी अनुशासन में नहीं होता, बल्कि एक आवारा ओर निर्जीव चेतना की हलचल का नाम है। ब्रह्माण्ड अनंत नहीं अनहद है। खैर, मुझे बहुत कुछ कहना है। लेकिन शायद अभी कहना ठीक नहीं हो। लेकिन यह सच्ची बात है कि जो कुछ भी मै लिख रहा हूं। कह रहा हूं। वह सब कुछ ब्रह्माण्ड में पहले से उपस्थित है। मैं तो उसे मात्र आप तक पहुंचा रहा हूं....।

7 comments:

  1. बहुत ही विचारोतेजक सार्गर्भित आलेख है धन्यवाद । अगर इसे दो भागों मे देते तो अधिक सुविधाजनक रहता। क्यों कि इसमे बहुत कुछ विचार्नीय और मनन करने योग्य है । धन्यवाद

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  2. हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में वैकल्पिक मीडिया का प्रतिनिधि "ब्लागप्रहरी क्लब" और प्रोफेशन से मिशन की ओर "जनोक्ति परिवार "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . आप हमारे ब्लॉग एग्रीगेटर (ब्लागप्रहरी : मुख्यधारा की मीडिया का विकल्प) पर पंजीयन करें . नीचे लिंक दिए गये हैं .
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  3. Nirmala ji ne sahi kaha..ye aalekh do hisson me vibhajit hota to behtar hota!
    Anek shubhkamnayen!

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  4. Maibhi Nirmalka ji se sahmat hun!
    Shubhkamnaon sahit swagat hai!

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  5. मोहता जी आपको ब्लॉग पर देखकर खुशी हुई। अच्छा लिखा है आपने। आप शायद मुझे भूल गए हों, पर मैं नहीं भूला, याद करिये वे दिन जब आप आकाशवाणी दिल्ली में थे और साउथ एक्स रहा करते थे और मुझसे और सुरेश यादव से मेरे निवास नारौजी नगर आया करते थे। खैर,ब्लॉग की दुनिया ने फिर मुलाकात करवाई,मेरे ब्लॉग्स पर भी एक दृष्टि डालें।
    सुभाष नीरव
    www.kathapunjab.blogspot.com
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  6. मोहता जी आपको ब्लॉग पर देखकर खुशी हुई।
    aapki pustak "kya prithvi ki sristi visfot se hue hai" pad chuka hoon
    jalore nagarpalika me aapse mulakat bhi sandeep joshi ke madhyam se ho chuki hai

    eise lagta hai famous philosopher fredrik neetshe hamare saath apne vichar baant rahe hoo
    is tarah ke lekhan ko jari rakhen

    blog jagat me aapka swagat hai

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  7. स्‍वागत एवं बधाई

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